आदिवासी संस्कृति की धड़कन: मांदर की थाप और परंपराओं का संगम

विशेष स्टोरी
फैज़ान अशर

जिसे दुनिया ग्लोबलाइजेशन कहती है, उसे जशपुर, झारखंड और ओड़िशा के सीमावर्ती अंचलों ने सदियों पहले जतरा के रूप में आत्मसात कर लिया था। कार्तिक पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक चलने वाला यह मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक कोरिडोर है, जो भौगोलिक सीमाओं को लांघकर लाखों लोगों को एक सूत्र में बांधता है। आज के डिजिटल और ई-कॉमर्स के दौर में भी जतरा का अस्तित्व में होना यह बताता है कि मानवीय संबंधों और सामाजिक सामूहिकता का कोई विकल्प नहीं है।

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लाइफलाइन से लाइफस्टाइल तक का सफर

एक दौर था जब जतरा दुर्गम गांवों की सप्लाई चेन हुआ करता था। बिना पक्की सड़कों वाले उस युग में, यह मेला साल भर की जरूरतों को पूरा करने वाला एकमात्र मॉल था। उस दौर में 5 से 50 पैसों के सिक्के, मिट्टी के बर्तन और लोहे के औजारों की प्रधानता थी। अब चकाचौंध वाली लाइटें, आधुनिक झूले और ब्रांडेड सामानों ने जगह ले ली है। बदलाव केवल सामानों में नहीं, बल्कि सोच में भी आया है। अब जतरा केवल जरूरत नहीं, बल्कि एक अनुभव बन चुका है।

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सोशल मीडिया के युग में फिजिकल नेटवर्किंग का मंच

आज के दौर में जहाँ रिश्ते फ्रेंड रिक्वेस्ट से शुरू होते हैं, जतरा आज भी फिजिकल नेटवर्किंग का सबसे बड़ा केंद्र है। पुराने समय में यह विवाह संबंधों को तय करने का सबसे बड़ा मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म था। यह आज भी एक ऐसा मंच है जहाँ लोग स्क्रीन से हटकर एक-दूसरे की आंखों में देखकर मिलते हैं, दुख-दर्द बांटते हैं और अपनी सामूहिकता का जश्न मनाते हैं।

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जतरा का आधुनिक चेहरा भले ही चमक-धमक वाला हो, लेकिन इसके पीछे का संघर्ष आज भी उतना ही कठिन है। सन्ना और मनोरा जैसे क्षेत्रों में जब तापमान 0 से 6 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है, तब झारखंड, बंगाल और बिहार से आए सैकड़ों व्यापारी तंबुओं में रहकर अपनी आजीविका कमाते हैं। ये व्यापारी 5-6 महीने अपने घर से दूर रहकर इस क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को गति देते हैं।

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बदलती सोच और लोगों की राय

बुजुर्ग पीढ़ी का कहना है कि पहले जतरा दिलों को जोड़ता था, अब यह केवल आंखों को लुभाने वाला बाजार बन गया है। वहीं युवा पीढ़ी का मानना है कि समय के साथ बदलाव अनिवार्य है। डीजे और आधुनिक झूले नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़े रखने का माध्यम हैं। सांस्कृतिक जानकारों के अनुसार जतरा एक जीवित विरासत है। इसमें आधुनिक सुविधाओं का स्वागत है, लेकिन इसकी आत्मा यानी लोक संगीत और मांदर की थाप सुरक्षित रहनी चाहिए।

विरासत का संरक्षण और डिजिटल डिटॉक्स

जतरा केवल खरीद-बिक्री का माध्यम नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता का प्रतीक है। जशपुर से पानपोश तक फैली यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि हमारी जड़ें मिट्टी और समुदाय से जुड़ी हैं। आधुनिकता के इस शोर में जतरा की सादगी को बचाए रखना ही इस अंचल की असली सफलता होगी।

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आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और स्क्रीन से चिपकी हुई पीढ़ी के लिए जतरा एक स्वाभाविक डिजिटल डिटॉक्स केंद्र बन गया है। जहाँ मोबाइल नेटवर्क अक्सर कमजोर होते हैं, वहाँ मांदर की गूँज और सामूहिक नृत्य लोगों को फिर से वास्तविक दुनिया और इंसानी रिश्तों से जोड़ देते हैं।

महिला सशक्तिकरण और इको-फ्रेंडली पहल

जतरा केवल बड़े व्यापारियों का ही नहीं, बल्कि स्थानीय ग्रामीण महिलाओं के लिए भी एक बड़ा आर्थिक मंच है। यहाँ स्वयं सहायता समूहों द्वारा बनाए गए हस्तशिल्प, वनोपज और पारंपरिक व्यंजनों को एक बड़ा बाजार मिलता है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जमीनी स्तर पर मजबूती प्रदान करता है। बदलते दौर में अब यह चर्चा भी शुरू हुई है कि जतरा को फिर से उसकी मिट्टी की महक की ओर ले जाया जाए। प्लास्टिक के खिलौनों के बजाय, स्थानीय शिल्पकारों द्वारा बनाए गए बाँस, लकड़ी और टेराकोटा के उत्पादों को बढ़ावा देना ही इस मेले के आधुनिक होने की सही दिशा होगी।

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जशपुरिया पहचान का महापर्व

जतरा महज एक कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि जशपुरिया जीवन दर्शन का एक लाइव म्यूजियम है। यह हमें सिखाता है कि भीषण ठंड और कठिन रास्तों के बावजूद, उत्सव मनाने का जज्बा ही जीवन की असली जीत है। इसे बचाना केवल परंपरा को बचाना नहीं, बल्कि अपनी पहचान को बचाना है।
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जतरा के इस आधुनिक सफर के अंत में यह समझना जरूरी है कि यह मेला सिर्फ आर्थिक लेनदेन का जरिया नहीं है। यह तो अखाड़ा की उस परंपरा का विस्तार है, जहाँ पैर थकते नहीं बल्कि मांदर की थाप पर थिरकते हुए नई ऊर्जा पाते हैं। डिजिटल पेमेंट और क्यूआर कोड के इस युग में भी, जतरा में बैठकर धुस्का-भजिया खाना और मिट्टी के बर्तनों की खनक सुनना एक अलग ही सुकून देता है। यह हमें याद दिलाती है कि हमारी जड़ें आज भी उस सादगी में बसी हैं, जहाँ दिखावा कम और अपनापन ज्यादा है।

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जशपुरिया संस्कृति में एक शब्द है— पइठू और सगा-संबंधी। जतरा आज भी वह जगह है जहाँ दूर-दराज के गांवों से आए सगा रिश्तेदार एक-दूसरे को गले लगाकर हाल-चाल पूछते हैं। मोबाइल के दौर में जहाँ बातचीत सिमट गई है, जतरा में होने वाली यह भेंट-मुलाकात सामाजिक ताने-बाने को टूटने से बचाए हुए है।

आज का युवा, जो जींस और टी-शर्ट पहनकर हाथ में स्मार्टफोन लिए मेले में घूमता है, जब वह पारंपरिक नृत्यों को देखता है, तो उसके भीतर अपनी संस्कृति के प्रति गौरव का भाव जागता है। जतरा वह स्कूल है, जो बिना किसी किताब के आने वाली पीढ़ी को अपनी लोककला और भाषा से जोड़े रखता है।

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जतरा जशपुर की वह अखय निधि है, जिसमें वक्त के साथ बदलाव तो आए हैं, लेकिन इसकी रूह आज भी वही है। यह हाड़ कंपाने वाली ठंड में आपसी भाईचारे की गर्माहट है। यह बाजार के शोर में डूबा हुआ एक लोकगीत है। जतरा को बचाए रखना दरअसल उस मानवीय गरिमा को बचाए रखना है, जो हमें मशीनों से अलग एक संवेदनशील समाज बनाती है। जतरा केवल बाजार नहीं, यह हमारी जशपुरिया पहचान का महापर्व है।

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