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रायपुर :

छत्तीसगढ़ में बच्चों, विशेषकर बालिकाओं की गुमशुदगी और उनकी बरामदगी को लेकर एक बेहद संवेदनशील और आंखें खोल देने वाली हकीकत सामने आई है। विधानसभा में पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों ने प्रदेश में मासूमों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था की चुनौतियों को लेकर एक गंभीर तस्वीर पेश की है। इन सरकारी आंकड़ों का सबसे परेशान करने वाला पहलू यह है कि घर से लापता होने वाले बच्चों में लड़कों की तुलना में लड़कियों की तादाद चार से पांच गुना अधिक है। हालांकि पुलिस प्रशासन लापता बच्चों की तलाश और उनकी बरामदगी के लिए लगातार सक्रिय है और कई जिलों में पुलिस का सफलता दर भी बेहतर है, लेकिन इसके बावजूद बड़े शहरी केंद्रों में हर साल पेंडिंग रह जाने वाले मामलों की संख्या एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

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सरकारी रिपोर्ट के विस्तृत विश्लेषण से यह साफ होता है कि जिन जिलों में आबादी और शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है, वहां बच्चे सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। प्रदेश की राजधानी रायपुर में यह स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है। रायपुर जिले में साल 2024 के दौरान 83 बालक और 457 बालिकाएं लापता दर्ज की गईं, जिनमें से पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए 81 बालकों और 434 बालिकाओं को सुरक्षित बरामद कर लिया था। लेकिन साल 2025 में यह संकट और गहरा गया, जब लापता होने वाले बच्चों की संख्या बढ़कर 119 बालक और 513 बालिकाओं तक पहुंच गई। इस दौरान पुलिस 98 बालकों और 350 बालिकाओं को ही ढूंढ सकी, जिसके कारण एक ही साल में 163 लड़कियां और 21 लड़के अपने घरों से दूर रह गए। साल 2026 में भी 25 जून तक राजधानी से 66 लड़के और 288 लड़कियां अपने घरों से लापता हो चुकी हैं, जिनमें से अब तक 48 बालक और 188 बालिकाएं ही बरामद की जा सकी हैं।

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न्यायधानी बिलासपुर में भी हालात बहुत ज्यादा अलग नहीं हैं और वहां भी बालिकाओं को तलाशने की चुनौती लगातार बड़ी होती जा रही है। बिलासपुर जिले में साल 2024 में 45 बालकों के मुकाबले 358 बालिकाएं लापता हुईं, जिनमें से 44 बालक और 337 बालिकाएं बरामद हुईं। अगले ही साल यानी 2025 में 67 बालक और 359 बालिकाओं की गुमशुदगी दर्ज की गई, जिसमें पुलिस ने 66 बालकों को तो ढूंढ निकाला लेकिन 359 लापता लड़कियों में से केवल 303 ही बरामद हो सकीं और 56 लड़कियां पेंडिंग लिस्ट में चली गईं। साल 2026 में 25 जून तक बिलासपुर में 44 बालकों में से 32 और 232 बालिकाओं में से केवल 111 को ही बरामद किया जा सका है, जिससे आधे से अधिक लड़कियों की तलाश अब भी पुलिस के लिए एक बड़ी परीक्षा बनी हुई है।

इसी तरह औद्योगिक हब दुर्ग जिले में भी शहरी क्षेत्र के अनुरूप ही बड़ा ग्राफ देखने को मिला है। दुर्ग में साल 2024 में 55 बालकों में से 53 और 246 बालिकाओं में से 238 को सुरक्षित ढूंढ निकाला गया था, जबकि साल 2025 में लापता हुए 70 बालकों में से 66 और 273 बालिकाओं में से 257 की बरामदगी की गई। साल 2026 में अब तक दर्ज 45 लापता लड़कों में से 35 और 142 लड़कियों में से 94 को पुलिस बरामद कर चुकी है। इसके अलावा बलौदाबाजार-भाटापारा में जहां साल 2024 में रिकवरी रेट लगभग शत-प्रतिशत के करीब था, वहीं साल 2025 में 279 लापता लड़कियों में से केवल 240 ही बरामद हो पाईं। जांजगीर-चांपा जिले में भी साल 2025 में 46 बालक और 252 बालिकाएं गायब हुई थीं, जिनमें से 39 बालक और 215 बालिकाएं बरामद हुईं, जबकि साल 2026 में 25 जून तक लापता हुई 119 बालिकाओं में से अब तक केवल 73 को ही रिकवर किया गया है।

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शहरी और मैदानी इलाकों की तुलना में अगर बात बस्तर और सरगुजा संभाग के सुदूर आदिवासी अंचलों की करें, तो वहां बड़े शहरों की तुलना में कागजी आंकड़े काफी कम दर्ज हैं और बच्चों को ढूंढने का रिकॉर्ड भी काफी मजबूत है। उदाहरण के लिए, दंतेवाड़ा जिले में साल 2024 में लापता हुए सभी 2 बालक और 6 बालिकाएं सुरक्षित बरामद कर ली गईं, जबकि साल 2025 में भी 6 में से 5 बालक और 15 में से 14 बालिकाएं सुरक्षित घर लौट आईं। इसी तरह नारायणपुर जिले में भी साल 2024 में दर्ज सभी 1 बालक और 8 बालिकाएं सकुशल बरामद की गईं और साल 2025 में भी लापता हुए 1 बालक और 15 बालिकाओं में से सभी को शत-प्रतिशत ढूंढ निकाला गया। हालांकि, इसके विपरीत सरगुजा जिले में साल 2025 में 132 बालिकाएं और जशपुर जिले में 133 बालिकाएं लापता दर्ज की गईं, जो यह बताती हैं कि सरगुजा संभाग के कुछ हिस्सों में बालिकाओं की गुमशुदगी की संख्या अब भी चिंताजनक बनी हुई है।

विधानसभा पटल पर रखे गए ये समूचे आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि छत्तीसगढ़ पुलिस लापता बच्चों को उनके परिवारों से मिलाने के लिए लगातार अभियान चला रही है और अधिकांश जिलों में पचासी फीसदी से अधिक बच्चों की बरामदगी पुलिस की सक्रियता को दर्शाती है। परंतु, सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि लापता होने वाले बच्चों का यह भारी अंतर, विशेषकर किशोरियों और बालिकाओं की अत्यधिक संख्या, सीधे तौर पर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में मानव तस्करी, प्रलोभन या अन्य संगठित अपराधों की आशंका को बल देता है। रायपुर और बिलासपुर जैसे बड़े हब में हर साल जो बच्चे बरामद नहीं हो पाते, वे हर साल पेंडिंग लिस्ट में जुड़ते जाते हैं और माता-पिता का इंतजार लंबा होता जाता है। विधानसभा की यह रिपोर्ट यह साफ संदेश देती है कि समाज और पुलिस प्रशासन को मिलकर बच्चों, विशेषकर किशोरियों की सुरक्षा के लिए और ज्यादा कड़े सुरक्षा चक्र और अवेयरनेस अभियानों की तत्काल आवश्यकता है।

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