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भारतीय जनमानस में मुनगा, जिसे हम सहजन या मोरिंगा के नाम से भी जानते हैं, सिर्फ एक सब्जी या औषधि मात्र नहीं है, बल्कि इसे मौसम का ‘थर्मामीटर’ माना जाता है। ग्रामीण परिवेश में सदियों से यह मान्यता चली आ रही है कि जैसे ही मुनगा के पेड़ों पर सफेद फूलों के गुच्छे लदने शुरू होते हैं, समझ लीजिए कि कड़ाके की ठंड की विदाई का वक्त आ गया है। इस साल भी मुनगा ने अपना धर्म निभाया है और टहनियां फूलों से भर गई हैं, लेकिन इस बार का मौसम कुदरत के इस पुराने कैलेंडर को चुनौती देता नजर आ रहा है। आमतौर पर जब सूरज की तपिश बढ़ती है और हवाओं में खुश्की आती है, तब मुनगा खिलता है, मगर इस साल आसमान से गिरता कोहरा और हड्डियों को कंपा देने वाली शीतलहर अब भी बरकरार है।

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मुनगा का खिलना एक वैज्ञानिक संकेत है कि वातावरण के तापमान में बदलाव आ रहा है, लेकिन इस बार की ठंड जाने का नाम ही नहीं ले रही है। सुबह की शुरुआत अब भी घने कोहरे से होती है और सूरज की धूप में वह गर्माहट महसूस नहीं हो रही जो मुनगा के फूलों के अनुकूल होती है।

विशेषज्ञों की मानें तो यह ‘क्लाइमेट शिफ्ट’ का एक बड़ा संकेत हो सकता है, जहाँ पेड़-पौधे तो अपने जैविक समय (Biological Clock) के अनुसार प्रतिक्रिया दे रहे हैं, पर वायुमंडलीय दबाव और पश्चिमी विक्षोभ के कारण ठंड का स्पैल लंबा खिंचता जा रहा है। लोक परंपराओं में कहा जाता है कि मुनगा का फूल आने के बाद होली की आहट शुरू हो जाती है, लेकिन वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा लग रहा है मानो बसंत और शिशिर (सर्दी) के बीच एक जंग छिड़ी हुई है।

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यह स्थिति खेती-किसानी के नजरिए से भी गौर करने वाली है। मुनगा के फूलों का समय से पहले आना या कड़ाके की ठंड के बीच खिलना परागण (Pollination) की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकता है। अगर ठंड और ज्यादा दिनों तक खिंची, तो इन कोमल फूलों के गिरने का डर रहता है जिससे सहजन की पैदावार पर असर पड़ सकता है।

फिलहाल, लोग मुनगा की इन सफेद पंखुड़ियों को उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं कि शायद इन्हें देखकर ही कड़ाके की सर्दी अपनी जिद छोड़ दे और गुनगुनी धूप का रास्ता साफ हो जाए। प्रकृति और मौसम के बीच का यह संघर्ष इस साल वाकई चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर जीत मुनगा की भविष्यवाणी की होगी या इस बार की जिद्दी ठंड की।

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