विशेष स्टोरी/ फैज़ान अशरफ

जशपुर जिले की प्राकृतिक सुंदरता और घने जंगलों के बीच एक ऐसी डरावनी सच्चाई छिपी है, जो पिछले पच्चीस वर्षों से यहाँ के परिवारों को उजाड़ रही है। वर्ष 2000 से लेकर 2025 तक के आंकड़े महज़ संख्या भर नहीं हैं, बल्कि उन 872 जिंदगियों की कहानी हैं जो सर्पदंश जैसी एक रोकी जा सकने वाली आपदा की भेंट चढ़ गईं।

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वर्ष 2000 से 2025 तक जशपुर जिले में सर्पदंश के कुल 872 प्रकरण दर्ज किए गए हैं और इन सभी प्रकरणों में 872 लोगों की मृत्यु हुई है। वर्ष 2000 में सर्पदंश के 63 प्रकरण सामने आए और 63 लोगों की मौत दर्ज की गई। वर्ष 2001 में यह संख्या बढ़कर 89 पर पहुंच गई, जबकि वर्ष 2002 में 65 प्रकरणों में 65 मौतें हुईं। वर्ष 2003 में 56, वर्ष 2004 में 58 और वर्ष 2005 में 49 लोगों की सर्पदंश से मृत्यु दर्ज की गई।

वर्ष 2006 में सर्पदंश से 72 मौतें हुईं, जबकि वर्ष 2007 में यह संख्या 62 रही। वर्ष 2008 में 44 और वर्ष 2009 में 43 लोगों की सर्पदंश के कारण जान गई। वर्ष 2010 में 35, वर्ष 2011 में 48 और वर्ष 2012 में 50 मौतें दर्ज की गईं। इसके बाद वर्ष 2013 में 38, वर्ष 2014 में 36 और वर्ष 2015 में 27 लोगों की सर्पदंश से मृत्यु हुई।

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वर्ष 2016 में 37, वर्ष 2017 में 33 और वर्ष 2018 में 31 लोगों की सर्पदंश से मृत्यु दर्ज की गई। हालांकि वर्ष 2018 में जहरीले कीट के काटने से अतिरिक्त 3 मौतें भी हुईं, जिससे उस वर्ष कुल मृत्यु संख्या 34 रही। वर्ष 2019 में सर्पदंश से 29, वर्ष 2020 में 43 और वर्ष 2021 में 49 मौतें दर्ज की गईं।

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वर्ष 2022 में 37, वर्ष 2023 में 36, वर्ष 2024 में 39 और वर्ष 2025 में 29 लोगों की सर्पदंश के कारण मृत्यु हुई है। इन सभी वर्षों को मिलाकर कुल 872 प्रकरण और 872 मौतें दर्ज होना जशपुर जिले में सर्पदंश को एक गंभीर और लगातार बनी रहने वाली स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उजागर करता है।

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यह आँकड़ा जशपुर की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक चेतना पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है। जिले में हर साल औसतन 30 से 50 लोग सांप के डंसने से दम तोड़ देते हैं, जो यह बताने के लिए काफी है कि यहाँ मौत कितनी खामोशी और निरंतरता के साथ अपना काम कर रही है।

 


इतिहास के पन्नों को पलटें तो वर्ष 2001 जशपुर के लिए काल बनकर आया था, जब अकेले उस साल 89 लोगों की मौत दर्ज की गई थी। इसके बाद भी 2002 से 2007 के बीच मौतों का तांडव जारी रहा, जहाँ हर साल 60 से अधिक लोग काल के गाल में समाते रहे। विडंबना यह है कि आधुनिक चिकित्सा के दावों और जागरूकता अभियानों के बावजूद, बीते पाँच वर्षों में स्थिति में कोई क्रांतिकारी सुधार नहीं दिखा है। साल 2021 से अब तक लगातार हो रही मौतें—जैसे 2024 में 39 और 2025 के शुरुआती महीनों में ही 29 का आंकड़ा—यह साबित करती हैं कि यह संकट आज भी उतना ही विकराल है जितना ढाई दशक पहले था।

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इस त्रासदी के पीछे की वजहें केवल सांपों की मौजूदगी तक सीमित नहीं हैं। असल दुश्मन तो वह दुर्गम भूगोल और गहरे पैठ बना चुका अंधविश्वास है, जो मरीज को अस्पताल की जगह ओझा और झाड़-फूंक के दर पर ले जाता है। खेतों में पसीना बहाते किसान, रात में जमीन पर सोती मासूम जिंदगियां और बारिश के दिनों में जंगलों से घिरे परिवारों के लिए एक सांप का दिखना मौत से रूबरू होने जैसा है। अक्सर समय पर इलाज न मिलना और ‘गोल्डन ऑवर’ यानी हमले के तुरंत बाद के कीमती समय का झाड़-फूंक में बर्बाद हो जाना ही जीवन और मृत्यु के बीच की सबसे बड़ी बाधा बन जाता है।


भौगोलिक विषमताएं भी इस आग में घी डालने का काम करती हैं। 2018 में    हुई मौतें गवाह हैं कि कैसे खराब सड़कें और स्वास्थ्य केंद्रों की दूरी एक इलाज योग्य मरीज को भी लाश में तब्दील कर देती हैं। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एंटी-स्नेक वेनम की पर्याप्त उपलब्धता हो और लोगों में प्राथमिक उपचार की सही समझ विकसित की जाए, तो इनमें से अधिकतर जानें बचाई जा सकती हैं। जशपुर की इस ‘सर्प-आपदा’ को अब केवल एक प्राकृतिक दुर्घटना मानकर नजरअंदाज करना आत्मघाती होगा। समय आ गया है कि इसे एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में देखा जाए, ताकि भविष्य में आंकड़ों की यह भयावह दौड़ थमे और जशपुर की गोद में फिर से खुशहाली लौट सके।

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