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प्रकृति के कैलेंडर में जैसे ही वसंत ने अपने सजीले कदम रखे, पूरी धरा किसी पुराने ब्लैक-एंड-व्हाइट टीवी से निकलकर अचानक ‘4K अल्ट्रा एचडी’ मोड में आ गई है। यह केवल एक ऋतु परिवर्तन नहीं, बल्कि कुदरत का वह जादुई ‘सनबाथ’ है, जिसने शीतकाल की धूसर और ठंडी चादर को उतारकर फेंक दिया है। शहर की कंक्रीट की दीवारों के बीच खामोश खड़े पेड़ों ने अपना पुराना ‘आधार कार्ड’ ही बदल डाला है—पतझड़ की पहचान मिटाकर अब वे नव-यौवन की मखमली चूनर ओढ़कर इठलाने लगे हैं।
हवाओं में जैसे ‘वसंती अफीम’ घुल गई हो, जो भी इन रास्तों से गुजर रहा है, वह पेड़ों के इस नए अवतार को देख ठगा सा रह गया है। कल तक जो शाखाएं नग्न, बेजान और लाचार खड़ी थीं, आज उन पर जीवन का ऐसा विस्फोट हुआ है कि देखकर किसी चमत्कार का भ्रम होता है।
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आम सरई महुआ पीपल और बरगद की टहनियों पर तांबे जैसे लाल रंग की चमकदार कोंपलें ऐसे फूट रही हैं, मानो किसी अदृश्य सुनार ने शाखाओं पर बेशकीमती माणिक जड़ दिए हों। दूसरी ओर, कड़वे नीम ने भी कोमल और ताजी पत्तियों का ऐसा धानी आभूषण पहन लिया है, जिसकी खुशबू भागदौड़ भरी जिंदगी में रूह को सुकून देने वाली औषधि बन गई है।
सबसे ज्यादा हैरान तो वह ‘कलर पार्टी’ कर रही है, जो इस बार उन गुमनाम और जंगली पेड़ों पर भी नजर आ रही है जिन्हें अक्सर हम अनदेखा कर देते थे। पलाश के दहकते हुए फूल हों या अमलतास की सुनहरी लटकनें, इन पेड़ों के प्राकृतिक श्रृंगार ने पूरे जंगल को एक ‘लिविंग थियेटर’ में बदल दिया है। कोयल की मधुर कूक अब केवल एक आवाज नहीं, बल्कि वसंत के इस शाही राज्याभिषेक का आधिकारिक शंखनाद है, जो सुबह की शांति को भंग कर दुनिया को इस उत्सव में शामिल होने का न्योता दे रही है।
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि पेड़ों का यह ‘मेकओवर’ हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। यह बदला हुआ स्वरूप हमें याद दिलाता है कि परिवर्तन ही सृष्टि का एकमात्र शाश्वत नियम है।
जिस तरह हर उदास पतझड़ के बाद एक शानदार बहार का आना निश्चित है, वैसे ही पेड़ों की यह नई हरियाली हमें सिखाती है कि पुराना त्यागना ही नए की सबसे सुंदर शुरुआत है।
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