नई दिल्ली: देश के सुदूर जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और दुर्गम इलाकों में रहने वाले जनजातीय समुदायों के जीवन में तकनीक एक मूक क्रांति का सूत्रपात कर रही है। लंबे समय तक मुख्यधारा के तकनीकी विकास से अछूते रहे इन इलाकों तक अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अपनी पहुंच बना चुकी है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि विकसित भारत का संकल्प तब तक अधूरा है, जब तक देश के अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति इस प्रगति का हिस्सा नहीं बनता। इसी सोच को धरातल पर उतारने के लिए सरकार ने तकनीक को एक बड़ा हथियार बनाया है, जिसके तहत एआई अब विशेष रूप से जनजातीय भाषाओं को समझने, उनमें संवाद करने और स्थानीय नागरिकों की समस्याओं का समाधान खोजने में सक्षम हो रहा है।

​इस पूरी मुहिम का सबसे बड़ा चेहरा बने हैं ‘आदिवाणी’ और ‘ट्राईबॉट’ जैसे अत्याधुनिक एआई प्लेटफॉर्म। ‘आदिवाणी’ एक ऐसा एआई आधारित अनुवादक है जो पाठ और आवाज दोनों के माध्यम से जटिल सरकारी नीतियों को जनजातीय बोलियों में बदलने का काम कर रहा है। वहीं दूसरी ओर ‘ट्राईबॉट’ एक बहुभाषी एआई सहायक के रूप में दूर-दराज के क्षेत्रों में लोगों की शिकायतों का तुरंत निवारण करने और उन्हें सीधी सहायता देने के लिए मुस्तैद है। इन बदलावों के पीछे सरकार का तर्क है कि अब कोई भी कल्याणकारी योजना सिर्फ कागजों या शहरों तक सीमित नहीं रहेगी और न ही भाषा की अज्ञानता विकास की राह में कोई बाधा बनेगी।

​इस अभूतपूर्व तकनीकी समावेशन का दायरा बेहद विशाल है। प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महा अभियान (पीएम-जनमन), धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान और राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं अब देश के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 549 जिलों में पूरी तरह सक्रिय हैं। डेटा-संचालित डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से करीब 63 हजार से अधिक गांवों के 5.5 करोड़ जनजातीय नागरिकों को सीधे जोड़ा जा रहा है। विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) की सटीक पहचान के लिए हजारों सर्वेक्षकों ने जमीनी स्तर पर लाखों परिवारों का डेटा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्ज किया है, जिससे आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी और रोजगार की बुनियादी जरूरतें सीधे लक्षित लाभार्थियों तक पहुंच रही हैं।

​यह बदलाव सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में भी ऐतिहासिक मील के पत्थर स्थापित कर रहा है। जनजातीय समाज में लंबे समय से अभिशाप बनी सिकल सेल बीमारी से लड़ने के लिए ‘बिरसा 101’ नामक देश की पहली स्वदेशी सीआरआईएसपीआर (CRISPR) आधारित जीन थेरेपी विकसित की गई है, जो आधुनिक विज्ञान के फायदों को सीधे आदिवासी अंचलों तक ले जाती है। इसके साथ ही ‘आयुरजीनोमिक्स’ और पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय के जरिए सदियों पुराने औषधीय ज्ञान को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित और सुरक्षित किया जा रहा है।

​वहीं दूसरी ओर, जनजातीय कला और संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए ‘ट्राईबेक्स’ नामक डिजिटल प्लेटफॉर्म और ‘आर्ट एंड क्राफ्ट एटलस ऑफ ट्राइबल इंडिया’ तैयार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य देश के पारंपरिक हस्तशिल्प, संगीत और उत्पादों की जीआई (Geographical Indication) क्षमता को पहचानकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाना है। जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव रंजना चोपड़ा के अनुसार, जब तकनीक समाज के सबसे संवेदनशील और दूरस्थ छोर पर बैठे व्यक्ति को सशक्त बनाती है, तभी उसका वास्तविक मूल्य सिद्ध होता है। यह डिजिटल समावेशन न केवल जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखेगा, बल्कि उनके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के नए द्वार खोलकर विकसित भारत की नींव को और मजबूत करेगा।

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