Supreme Court:सुप्रीम कोर्ट ने 40 साल पुराने किरायेदारी विवाद में फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी किरायेदार बैंक का दूसरे बैंक में विलय हो जाता है, तब भी मकान मालिक की लिखित अनुमति के बिना कब्जा हस्तांतरित नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने पंजाब नेशनल बैंक (PNB) को दिल्ली के कनॉट सर्कल स्थित परिसर 31 जनवरी 2027 तक खाली करने का निर्देश दिया।

यह फैसला केवल बैंकों तक सीमित नहीं है, बल्कि किरायेदारी कानून, बैंक विलय और मकान मालिक के अधिकार से जुड़े मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

क्या है पूरा मामला?

  • 1947 में हुई शुरुआत: ब्रिटिश मोटर कार कंपनी लिमिटेड ने दिल्ली के प्रताप भवन, कनॉट सर्कल स्थित अपना व्यावसायिक परिसर हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक (HCB) को किराये पर दिया था।
  • 1986 में हुआ बैंक विलय: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की योजना के तहत दिसंबर 1986 में HCB का पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में विलय हो गया। इसके बाद उसी परिसर का उपयोग PNB करने लगा।
  • 1987 में कोर्ट पहुंचा मामला: मकान मालिक ने अदालत में बेदखली याचिका दायर करते हुए कहा कि उसकी लिखित अनुमति के बिना परिसर का कब्जा PNB को सौंपना दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 14(1)(ख) का उल्लंघन है।
  • 40 साल चली कानूनी लड़ाई: यह विवाद स्थानीय अदालत से शुरू होकर आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां लगभग चार दशक बाद अंतिम फैसला सुनाया गया।

Supreme Court ने क्या कहा?

Supreme Court ने स्पष्ट किया कि सरकारी योजना के तहत हुआ बैंक विलय भी मकान मालिक की लिखित अनुमति लेने की शर्त को समाप्त नहीं करता। अदालत ने माना कि मूल किरायेदार के स्थान पर नया बैंक आने से कानून के तहत कब्जा हस्तांतरण माना जाएगा और यदि अनुमति नहीं ली गई है तो बेदखली की कार्रवाई वैध होगी।

फैसले की मुख्य बातें

  • PNB को 31 जनवरी 2027 तक परिसर खाली करने का आदेश दिया गया।
  • मकान मालिक की लिखित अनुमति के बिना किराये का कब्जा दूसरे संस्थान को नहीं सौंपा जा सकता।
  • सरकारी योजना या बैंक विलय होने पर भी किरायेदारी कानून के नियम लागू रहेंगे।

आम लोगों और कारोबारियों पर क्या असर पड़ेगा?

  • यह फैसला सभी व्यावसायिक किरायेदारों के लिए महत्वपूर्ण है।
  • बैंक, कंपनियां और अन्य संस्थान विलय या अधिग्रहण के दौरान मकान मालिक की सहमति को नजरअंदाज नहीं कर सकेंगे।
  • मकान मालिकों के अधिकारों को इस फैसले से और अधिक कानूनी मजबूती मिली है।

40 साल बाद खत्म हुआ विवाद

करीब चार दशक तक चली कानूनी लड़ाई के बाद Supreme Court ने इस मामले का अंतिम निपटारा कर दिया। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसे मामलों में यही फैसला महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जाएगा। ताज़ा खबरों और अपडेट्स के लिए हमें Facebook और Instagram पर फॉलो करें।

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