रायपुर।

छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों में पेयजल परियोजनाओं को लेकर राज्य सरकार ने एक बड़ा और नीतिगत बदलाव किया है। प्रदेश के शहरों और कस्बों में पानी की सप्लाई व्यवस्था को अधिक सुव्यवस्थित और विवाद-मुक्त बनाने के लिए नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने नए और कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी नगरीय निकाय में नई पेयजल परियोजनाओं के प्रस्ताव तब तक तैयार नहीं किए जाएंगे, जब तक संबंधित तकनीकी और प्रशासनिक विभागों से उसके लिए आवश्यक मंजूरी नहीं मिल जाती। विभाग द्वारा जारी यह निर्देश राज्य के सभी नगर निगम आयुक्तों, नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों के मुख्य नगर पालिका अधिकारियों (CMO) पर तत्काल प्रभाव से लागू कर दिए गए हैं। इस पूरी पहल का मुख्य उद्देश्य नगरीय क्षेत्रों के हर घर में घरेलू नल कनेक्शन के माध्यम से सुरक्षित और निर्बाध पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करना है।

विभाग द्वारा जारी नई गाइडलाइन के अनुसार, अब किसी भी पेयजल परियोजना की शुरुआत कागजी स्तर पर करने से पहले जमीन पर पुख्ता तैयारी करनी होगी। नई व्यवस्था के तहत सबसे पहले परियोजना के लिए एक उपयुक्त और बारहमासी सतही जल स्रोत (Surface Water Source) का चयन किया जाएगा। जल स्रोत के चयन के लिए जल संसाधन विभाग, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) और नगरीय निकाय के तकनीकी अधिकारियों की एक संयुक्त टीम बनाई जाएगी, जो प्रस्तावित स्थल का भौतिक और संयुक्त निरीक्षण करेगी। इस संयुक्त निरीक्षण के बाद जल संसाधन विभाग से पानी के उपयोग (Water Allocation) की आधिकारिक अनुमति ली जाएगी। यह अनुमति मिलने के बाद ही परियोजना की विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPR) तैयार की जाएगी और उसे अंतिम स्वीकृति के लिए शासन को भेजा जाएगा। इससे पहले बिना अनुमति के डीपीआर बनाने की परिपाटी पर अब पूरी तरह रोक लगा दी गई है।

इस नई नीति में पाइपलाइन बिछाने के दौरान आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों को भी पहले ही दूर करने का प्रावधान किया गया है। अक्सर देखा जाता है कि योजना स्वीकृत होने के बाद दूसरे विभागों की जमीन आने के कारण काम सालों-साल अटका रहता है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने अनिवार्य किया है कि यदि पेयजल परियोजना की पाइपलाइन लोक निर्माण विभाग (PWD), वन विभाग, राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) या रेलवे जैसी अन्य एजेंसियों की भूमि से होकर गुजरनी है, तो डीपीआर की स्वीकृति से पहले ही उन संबंधित विभागों से ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ (NOC) और मार्ग का अधिकार (Right of Way) की अनुमति लेनी होगी। इस कदम से न केवल सरकारी धन की बर्बादी रुकेगी, बल्कि परियोजनाएं अपने निर्धारित समय पर पूरी हो सकेंगी, जिससे आम जनता को समय पर शुद्ध पेयजल का लाभ मिल सकेगा।

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