जशपुर।
जिला प्रशासन जशपुर द्वारा संचालित महत्वाकांक्षी “यशस्वी जशपुर” कार्यक्रम के अंतर्गत इतिहास विषय के व्याख्याताओं का एकदिवसीय विषय अभिमुखीकरण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य इतिहास विषय के अध्यापन को अधिक प्रभावी, रोचक एवं प्रयोगात्मक बनाना, विद्यार्थियों में तार्किक चिंतन, विश्लेषणात्मक क्षमता तथा इतिहास के प्रति गहरी रुचि विकसित करना था। साथ ही इतिहास व्याख्याताओं को उनके दायित्वों का बोध कराते हुए यह संकल्प दिलाया गया कि वे पूरे शैक्षणिक वर्ष अपने विद्यालय, विद्यार्थियों, समाज, राज्य एवं राष्ट्र के प्रति समर्पित भाव से कार्य करेंगे।

कार्यक्रम का शुभारंभ आयोजन समिति के व्याख्याता राजेंद्र प्रेमी द्वारा प्रेरणादायी गीत “शिक्षक तस्वीर बदलेंगे, इतिहास पढ़ेंगे इतिहास गढ़ेंगे, की भावपूर्ण प्रस्तुति से हुआ। इस गीत ने उपस्थित सभी व्याख्याताओं में नई ऊर्जा एवं उत्साह का संचार किया।

इसके पश्चात यशस्वी जशपुर से जुड़े व्याख्याता संजय दास ने “सर्विस और जॉब” के बीच के मूलभूत अंतर को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने शिक्षकों को प्रेरित करते हुए कहा कि शिक्षण केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण की सेवा है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यशस्वी जशपुर के नोडल अधिकारी श्री विनोद कुमार गुप्ता ने इतिहास विषय को विद्यार्थियों के जीवन से जोड़कर पढ़ाने पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि विषय के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करने के लिए केवल पुस्तक आधारित अध्ययन पर्याप्त नहीं है, बल्कि गतिविधियों, प्रयोगों, स्थानीय उदाहरणों तथा नवाचारों के माध्यम से इतिहास को जीवंत बनाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि इतिहास विषय में भविष्य के अनेक करियर अवसर उपलब्ध हैं, जिनकी जानकारी विद्यार्थियों तक पहुँचाना भी शिक्षकों का महत्वपूर्ण दायित्व है।

विषयगत सत्र में इतिहास के मास्टर ट्रेनर डॉ. मिथलेश कुमार पाठक एवं जयेश सौरभ टोपनो ने कक्षा 11 एवं 12 के इतिहास विषय के अध्यायों का क्रमवार विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रत्येक अध्याय के उद्देश्य, प्रमुख अवधारणाओं तथा उन्हें प्रभावी ढंग से पढ़ाने की शिक्षण विधियों पर विस्तार से चर्चा की।

अपने व्याख्यान की शुरुआत करते हुए डॉ. मिथलेश कुमार पाठक ने अमेरिका के प्रसिद्ध टाइम कैप्सूल का उदाहरण प्रस्तुत किया और बताया कि विश्व स्तर पर लोग अपने इतिहास एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति कितने सजग हैं। उन्होंने कहा कि टाइम कैप्सूल भविष्य की पीढ़ियों के लिए वर्तमान समय का जीवंत दस्तावेज होता है। इसके माध्यम से उन्होंने विद्यार्थियों में इतिहास के महत्व को रोचक ढंग से समझाने की शिक्षण पद्धति प्रस्तुत की।

उन्होंने “ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ” अध्याय से चर्चा प्रारंभ करते हुए लगभग 5000 वर्ष पूर्व की सिंधु सभ्यता से लेकर ईसा पूर्व 600 से ईस्वी 600 तक के भारतीय इतिहास का विस्तृत विश्लेषण किया। इस दौरान समाज, धर्म, शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, भक्ति परंपरा, विदेशी यात्रियों के विवरण तथा 8 वीं से 17वीं शताब्दी के बीच विकसित भक्ति एवं सूफी आंदोलन की प्रमुख विशेषताओं को सरल एवं रोचक उदाहरणों के माध्यम से समझाया। साथ ही प्रत्येक अध्याय को गतिविधि एवं प्रयोग आधारित शिक्षण से जोड़ने के व्यावहारिक उपाय भी बताए।

दूसरे सत्र में जयेश सौरव सौरभ टोपनो ने मध्यकालीन भारत में हुए सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिवर्तनों से लेकर आधुनिक भारत के उदय तक की महत्वपूर्ण घटनाओं का विस्तृत विश्लेषण किया। उन्होंने उपनिवेशवाद, ग्रामीण समाज, 1857 का स्वतंत्रता संग्राम,स्वतन्त्रता आंदोलन मे गाँधी जी का योगदान भारतीय संविधान का निर्माण तथा दक्षिण कौशल के इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी बताया कि विद्यालयों में उपलब्ध स्थानीय संसाधनों एवं सरल प्रयोगों के माध्यम से इतिहास विषय को विद्यार्थियों के लिए अधिक रुचिकर बनाया जा सकता है।

कार्यक्रम की एक विशेष गतिविधि के अंतर्गत जिले के विभिन्न विकासखंडों से आए इतिहास व्याख्याताओं को अध्यायवार समूहों में विभाजित किया गया। प्रत्येक समूह ने अपने निर्धारित अध्याय की रचनात्मक एवं नवाचारी प्रस्तुति दी तथा यह बताया कि संबंधित अध्याय को गतिविधियों, प्रयोगों एवं सहभागितापूर्ण शिक्षण विधियों के माध्यम से किस प्रकार प्रभावी बनाया जा सकता है। सभी समूहों की प्रस्तुतियों की सराहना की गई तथा विशेषज्ञों द्वारा आवश्यक सुझाव भी दिए गए।

समापन सत्र में सभी प्रतिभागी व्याख्याताओं से फीडबैक प्राप्त किया गया। उपस्थित शिक्षकों ने संकल्प लिया कि वे इतिहास विषय को केवल परीक्षा तक सीमित न रखकर विद्यार्थियों में जिज्ञासा, तार्किक सोच, सांस्कृतिक चेतना एवं राष्ट्र के गौरवपूर्ण इतिहास के प्रति सम्मान विकसित करने का सतत प्रयास करेंगे। साथ ही इतिहास को विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायी एवं जीवनोपयोगी विषय बनाने हेतु वर्षभर नवाचार आधारित शिक्षण पद्धतियों का उपयोग करेंगे।

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