केंद्र सरकार का बड़ा फैसला छत्तीसगढ़ में दलहन तिलहन की एमएसपी खरीदी से किसानों को मिलेगा सीधा लाभ
जशपुर।
जिले की धान खरीदी व्यवस्था में लंबे समय से चल रहे खेल पर आखिरकार से परदा उठा, और यह परदा हटा सिर्फ इसलिए क्योंकि शिकायतकर्ता विनय चौहान , पुरन वर्मा,दिलीप वैध पीछे हटने को तैयार नहीं थे। महीनों तक लगातार शिकायतें, दस्तावेज़ और चेतावनियों के बाद प्रशासन को मजबूर होकर जांच करानी पड़ी, जिसमें 6 करोड़ 55 लाख 26 हजार 979 रुपये 40 पैसे के गबन की पुष्टि हुई और FIR दर्ज करनी पड़ी।
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यह कहना अब गलत नहीं होगा कि यदि विनय चौहान बार बार कलेक्टर कार्यालय और संबंधित विभागों के चक्कर न लगाते, तो यह पूरा घोटाला आज भी कागजों में दफन रहता। 15 सितंबर 2025 , 6 अक्टूबर 2025 13 नवंबर 2025 और अंतिम 5 दिसंबर 2025 को दी गई शिकायतों में उन्होंने साफ तौर पर बताया था कि वर्ष 2024–25 की धान खरीदी में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हो रही हैं, धान कागजों में खरीदा दिखाया जा रहा है, लेकिन न तो वह धान भौतिक रूप से मौजूद है और न ही मिलों तक सही मात्रा में पहुंच रहा है।
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जांच शुरू हुई तो कोनपारा धान उपार्जन केंद्र से जो तस्वीर सामने आई, उसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए। ऑनलाइन रिकॉर्ड में जहां 1 लाख 61 हजार 250 क्विंटल धान की खरीदी दिखाई गई, वहीं मिल और संग्रहण केंद्रों तक केवल 1 लाख 40 हजार 663.12 क्विंटल धान ही पहुंचा। भौतिक सत्यापन में 20 हजार 586.88 क्विंटल धान गायब पाया गया, जिसकी कीमत करोड़ों में आंकी गई। इसी कमी ने पूरे घोटाले की नींव खोल दी।
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लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। विनय चौहान का दावा है कि कोनपारा सिर्फ एक उदाहरण है। जिले में कुल 46 धान उपार्जन केंद्र हैं, जिनमें से जांच के दौरान केवल 10 समितियों का लेखा जोखा ही सही पाया गया। बाकी केंद्रों को लेकर गंभीर संदेह बना हुआ है, लेकिन वहां अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
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जशपुर मुख्यमंत्री जी का जिला और घोटाला उनके विधानसभा का है ।सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पहली शिकायत के समय ही करीब 75 हजार क्विंटल धान की घटत सामने आ चुकी थी। आरोप है कि DO के जरिए राइस मिलर्स के साथ मिलकर इस गड़बड़ी को मैनेज किया गया और मामले को दबाने की कोशिश होती रही। धान खरीदी से लेकर मिलिंग और परिवहन तक हर चरण में राइस मिलर्स की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि बिना उनकी मिलीभगत के इतनी बड़ी मात्रा में धान का गायब होना संभव नहीं माना जा रहा।
दिसंबर महीने में जिले की लगभग 70 राइस मिलों का फिजिकल वेरिफिकेशन भी हुआ था, जिसमें भारी अनियमितताएं सामने आईं, इसके बावजूद न तो मिलर्स पर कोई ठोस कार्रवाई हुई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों पर। इससे यह संदेह और गहराता है कि कहीं न कहीं संरक्षण की परतें अब भी सिस्टम पर जमी हुई हैं।
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कोनपारा मामले में भले ही छह अधिकारियों और कर्मचारियों पर FIR दर्ज कर ली गई हो, लेकिन जनचर्चा का बड़ा सवाल यही है कि क्या ये सिर्फ मोहरे हैं। अगर विनय चौहान लगातार पीछे न पड़ते, तो क्या यह जांच कभी होती। और अगर उन्होंने बाकी केंद्रों की बात न उठाई होती, तो क्या यह घोटाला सिर्फ एक केंद्र तक सीमित दिखा दिया जाता।
विनय चौहान का कहना है कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी धान खरीदी व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि जब तक जिले के सभी 46 उपार्जन केंद्रों, सभी राइस मिलर्स और संरक्षण देने वाले अधिकारियों की निष्पक्ष जांच नहीं होती, वे चुप नहीं बैठेंगे।
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यह सिर्फ 6.55 करोड़ के गबन की कहानी नहीं है, यह उस दबाव की कहानी है जिसने सिस्टम को सच मानने और कार्रवाई करने पर मजबूर किया।



