देश की ग्राम पंचायतों के विकास और कामकाज को परखने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2023-24 की ‘पंचायत एसेट इंडेक्स’ (PAI 2.0) रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में पंचायतों को उनके काम के आधार पर अलग-अलग ग्रेड दिए गए हैं, जिसमें छत्तीसगढ़ की पंचायतों के आंकड़े भी सामने आए हैं।

छत्तीसगढ़ की पंचायतों के विकास और कामकाज को लेकर जो ताजा आंकड़े आए हैं वे प्रदेश की जमीनी हकीकत का एक मिला-जुला चित्र पेश करते हैं। कुल 11,643 ग्राम पंचायतों के मूल्यांकन में यह बात साफ नजर आती है कि कुछ पंचायतों ने बहुत ऊंचा मानक स्थापित किया है तो बड़ी संख्या में पंचायतें अभी मध्यम स्तर पर संघर्ष कर रही हैं।

​प्रदेश की केवल 30 पंचायतें ए ग्रेड यानी उत्कृष्ट श्रेणी में जगह बना पाई हैं। हालांकि यह संख्या कम लग सकती है लेकिन ये वे पंचायतें हैं जिन्होंने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, स्वच्छता और बुनियादी ढांचे में 75 से 90 प्रतिशत तक अंक हासिल किए हैं। ये पंचायतें अन्य क्षेत्रों के लिए एक मॉडल या उदाहरण की तरह काम करती हैं।

​सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि 3,936 पंचायतें बी ग्रेड में हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि प्रदेश की एक बड़ी आबादी वाली पंचायतों में विकास के काम सही पटरी पर हैं और वे सुधार की ओर अग्रसर हैं। इन्हें थोड़ा सा और सरकारी सहयोग मिले तो ये भी उत्कृष्ट श्रेणी में शामिल हो सकती हैं।

​चिंता और सुधार का मुख्य क्षेत्र सी और डी ग्रेड वाली पंचायतें हैं जिनकी संख्या काफी अधिक है। 5,941 पंचायतें औसत यानी सी ग्रेड में हैं और 1,736 पंचायतें डी ग्रेड में हैं। डी ग्रेड उन पंचायतों को दिया गया है जिन्होंने 40 प्रतिशत से भी कम अंक प्राप्त किए हैं। इसका अर्थ यह है कि इन इलाकों में बिजली, पानी, पक्की सड़कें या डिजिटल पंचायत जैसी सुविधाओं का अभी अभाव है।

​सरकार की इस ग्रेडिंग का मुख्य उद्देश्य यही है कि जिन पंचायतों को डी ग्रेड मिला है, वहां प्रशासन विशेष ध्यान दे सके। यह डेटा केवल अंकों का खेल नहीं है बल्कि यह बताता है कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण विकास का बजट और नीतियां कहां सबसे ज्यादा केंद्रित होनी चाहिए।

पंचायतों के लिए बनाया गया यह ग्रेडिंग सिस्टम ठीक वैसा ही है जैसे स्कूलों में बच्चों को उनके प्रदर्शन के आधार पर रिजल्ट कार्ड दिया जाता है। यह सिस्टम बताता है कि कोई पंचायत अपने गांव के विकास के लिए कितनी सक्रियता से काम कर रही है।

​इसे समझने के लिए इसके पैमानों को देखना जरूरी है। जब हम ए ग्रेड की बात करते हैं, तो इसका मतलब है कि वह पंचायत ‘टॉपर्स’ की सूची में है। वहां सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंच रहा है, रिकॉर्ड डिजिटल हैं और बुनियादी सुविधाएं जैसे साफ-सफाई और पानी की व्यवस्था बेहतरीन है।

बी ग्रेड उन पंचायतों को दर्शाता है जो विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ रही हैं। इनका प्रदर्शन अच्छा है, लेकिन अभी भी कुछ छोटे-मोटे सुधारों की गुंजाइश बाकी है ताकि वे उत्कृष्ट श्रेणी में आ सकें।

सी ग्रेड को हम ‘औसत’ मान सकते हैं। यह ग्रेड बताता है कि पंचायत काम तो कर रही है, लेकिन उसकी गति धीमी है। ऐसी पंचायतों में अभी बहुत सी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने की जरूरत है।

​सबसे आखिरी में आता है डी ग्रेड, जिसे ‘बिगिनर’ या शुरुआती स्तर कहा जाता है। इसका मतलब है कि वह पंचायत विकास के मामले में अभी काफी पीछे है। यहां स्वास्थ्य, शिक्षा या प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव और सरकारी मदद की तत्काल आवश्यकता है।

​कुल मिलाकर, इस स्कोरकार्ड का असली मकसद पंचायतों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा करना है। इससे प्रशासन को यह समझने में मदद मिलती है कि किन गांवों पर ज्यादा ध्यान देने और फंड देने की जरूरत है ताकि हर ग्रामीण इलाके का समान विकास हो सके।

इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी बात यह रही कि पूरे देश में एक भी पंचायत ‘ए+’ ग्रेड (90 से ज्यादा अंक) हासिल नहीं कर सकी। छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्यों की बात करें तो मध्य प्रदेश और ओडिशा की तुलना में छत्तीसगढ़ अपनी पंचायतों के डिजिटलीकरण और डेटा मैनेजमेंट में सक्रियता से काम कर रहा है। सरकार का उद्देश्य इस रैंकिंग के जरिए उन पंचायतों की पहचान करना है जहाँ विकास की गति धीमी है, ताकि वहाँ लक्षित रूप से सुधार किया जा सके।

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