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छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों, विशेषकर सरगुजा जशपुर, और छोटा नागपुर के पठारी इलाकों में जीवन आज भी प्रकृति की लय पर चलता है।

यहाँ के आदिवासियों का खान-पान केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि उनकी सदियों पुरानी विरासत है। इन्हीं में से एक बेशकीमती सौगात है ‘पिठारू कांदा’, जिसे वैज्ञानिक भाषा में Dioscorea belophylla या Spear-Leaved Yam कहा जाता है।

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आदिवासियों के ज्यादातर गाँव जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों में बसे होते हैं, जहाँ वे अपनी संस्कृति और परंपरा को निभाते हुए एक संघर्षमयी लेकिन प्रकृति से जुड़ा जीवन जीते हैं। ऐसे कठिन समय में जंगल ही उनका सबसे बड़ा सहारा होता है और पिठारू जैसा कंद-मूल उनके नाश्ते और भोजन का मुख्य आधार बनता है।

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जमीन की गहराई में छिपे इस खजाने को ढूंढना और निकालना अपने आप में एक अद्भुत कला है। अनुभवी ग्रामीण इसके पत्तों को देखकर ही पहचान लेते हैं कि मिट्टी के नीचे कहाँ कांदा छिपा है। यह कांदा जमीन के लगभग 2 से 3 फीट अंदर पाया जाता है, जिसे निकालने के लिए साबर, गैती और फावड़े जैसे पारंपरिक औजारों का उपयोग किया जाता है। खुदाई के दौरान पत्थरों और पेड़ों की उलझी हुई जड़ों के बीच से इसे बड़ी सावधानी से बाहर निकाला जाता है।

झारखण्ड छत्तीसगढ़ के इन जंगलों में पिठारू के अलावा कुंदरूकांदा, पुतलुकांदा, सियोकांदा और बैजांडकांदा जैसी कई अन्य प्रजातियां भी पाई जाती हैं, जो आदिवासियों के भोजन की विविधता को दर्शाती हैं।

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जंगल से घर लाने के बाद इसे तैयार करने की प्रक्रिया भी काफी धैर्यपूर्ण होती है। कांदे पर जमी हुई मिट्टी को पूरी तरह साफ करने के लिए इसे लगभग एक घंटे तक पानी में भिगोकर रखा जाता है और फिर दोबारा साफ पानी से धोया जाता है।

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इसके पश्चात इसे एक बर्तन में थोड़े नमक के साथ करीब एक घंटे तक उबाला जाता है ताकि इसका प्राकृतिक स्वाद और मिठास निखर कर आए। पकने के बाद जब यह ठंडा हो जाता है, तो इसके पतले छिलके को उतारकर इसे बड़े चाव से खाया जाता है। आदिवासी समाज में इसे न केवल उबालकर खाया जाता है, बल्कि इसकी स्वादिष्ट सब्जी और चोखा (भर्ता) बनाकर भी परोसा जाता है।

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पिठारू कांदा केवल स्वाद में ही लाजवाब नहीं है, बल्कि अपनी तासीर और औषधीय गुणों के कारण यह बाज़ार में भी अपनी खास पहचान रखता है। गाँव के हाट-बाज़ारों में ग्रामीण महिलाएँ इसे पत्तों के बने ‘दोना’ में बेचती नजर आती हैं, जहाँ एक दोने की कीमत लगभग 50 रुपये होती है। जो लोग इसके दुर्लभ होने और इसके स्वास्थ्य लाभों से भली-भांति परिचित हैं, उनके लिए यह किसी बेशकीमती वस्तु से कम नहीं है, यही वजह है कि बाज़ार में इसकी कीमत 500 से 600 रुपये प्रति किलो तक पहुँच जाती है।

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जशपुर के एक ग्रामीण ने बताया, “हमारे लिए जंगल ही हमारी रसोई है। पूर्वजों के समय से हम पिठारू कांदा खाकर अपना पेट पालते आए हैं। इसे ढूंढने के लिए हम पत्तों की पहचान करते हैं और साबर-गैती से जमीन को 2-3 फीट गहरा खोदते हैं। पत्थरों और जड़ों के बीच से इसे निकालना मेहनत का काम है।”

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​उन्होंने आगे कहा, “खोदने के बाद इसे घंटों पानी में भिगोकर साफ करते हैं और फिर नमक डालकर चूल्हे पर उबालते हैं। पकने के बाद इसका पतला छिलका उतारकर हम इसे नाश्ते में खाते हैं। इसकी सब्जी और चोखा भी लाजवाब बनता है।

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वास्तव में, पिठारू कांदा छत्तीसगढ़ की उस ‘जंगल की रसोई’ का प्रतीक है, जो बिना किसी आधुनिक संसाधन के आज भी शुद्ध पोषण और परंपरा की खुशबू समेटे हुए है।

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