​”बेखुदी का वन-शॉट: कुदरती जाम में डूबी हवाएँ और दरख्तों का इश्किया मिजाज”

​जशपुर।

अगर आप सोचते हैं कि नशा सिर्फ जाम में होता है, तो एक बार फागुन में जशपुर के जंगलों से होकर गुज़रिए। यहाँ की हवाओं में ऐसी मदहोश करने वाली खुश्बू घुली है, जो बिना पिए ही आपको झूमने पर मजबूर कर देगी। यह शराब का नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रेम का नशा है, जो सीधे रूह में उतरता है!
​सड़कें नहीं, ये तो ‘इश्क़ के रास्ते’ हैं…….

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​जशपुर की सड़कें इन दिनों सिर्फ़ पगडंडियां नहीं रहीं, ये तो ‘इश्क़ के रास्ते’ बन गई हैं। इन पर कदम रखते ही आप एक अलग दुनिया में पहुँच जाते हैं, जहाँ हर साँस के साथ कोई मीठी खुमारी सी चढ़ने लगती है.

​आम के बौर की मदहोशी

अभी आम के पेड़ों पर बौर आने शुरू हुए हैं। इनकी भीनी-भीनी, मीठी गंध हवा में ऐसी घुल गई है कि पूरा वातावरण मादक हो उठा है। यह गंध नहीं, बल्कि ‘मधुमास’ का पहला बुलावा है, जो सीधे दिल पर दस्तक देता है।

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महुआ के नए फूलों की ज़मीन पर गिरती नर्म खुशबू और सरई (साल) के फूलों की अनोखी, गहरी महक—दोनों मिलकर एक ऐसा प्रेम-गीत रचते हैं, जो किसी भी शहरी परफ्यूम को मात दे दे। इनकी गंध इतनी तीखी और मोहक है कि राहगीर अनायास ही थम जाते हैं, जैसे किसी प्रेमी की निगाहें अपनी प्रेमिका पर टिक जाएं।

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लीची के फूलों की हल्की, रसीली सुगंध हवा में ऐसी तैरती है, जैसे कोई मासूम प्रेमिका अपनी मीठी बातों से मन मोह ले। यह एक ऐसी मिठास है, जो बिना छुए ही आपको भीतर तक भिगो देती है।

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​भँवरों का गुंजन और चिड़ियों का कलरव: ‘इश्क़ की धुन’

​यह सिर्फ फूलों की खुशबू नहीं, बल्कि पूरे जंगल का संगीत है जो इस खुमारी को और गहराता है।
​भँवरों और मधुमक्खियों का गुंजन: आम और लीची के फूलों पर मंडराते भँवरों और मधुमक्खियों की लगातार गुंजन ऐसी लगती है, जैसे ये प्रकृति के सबसे बड़े प्रेमियों के लिए ‘इश्क़ की धुन’ बजा रहे हों।

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जंगल में पेड़ों की डालियों पर चिड़ियों का चहचहाना, हर खुशबूदार मोड़ पर एक नया प्रेम-गीत सुनाता है। उनका कलरव ऐसा महसूस होता है, जैसे ये आपस में मोहब्बत की बातें कर रही हों, और हर बात में फागुन की मिद्दी खुमारी घुली हो।

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​पत्तों की महक में छिपी ‘अजीब सी खुमारी’

​सिर्फ फूल ही नहीं, इस मौसम में नए और पुराने पत्तों की भी एक अजीब सी खुशबू होती है—एक मिट्टी जैसी सोंधी, थोड़ी कसैली पर बेहद आकर्षक। यह महक बताती है कि प्रेम केवल दिखावा नहीं, बल्कि जीवन की जड़ों से जुड़ा एक गहरा अहसास है। यही पत्तों की महक है जो पूरे माहौल को एक ‘अजीब सी खुमारी’ से भर देती है, जहाँ आप बिना पिए ही नशे में चूर हो जाते हैं।
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फागुन में यहाँ के जंगल किसी जादूगर की तरह हैं, जो अपनी खुशबुओं से ऐसा सम्मोहन पैदा करते हैं कि हर कोई मदहोश हो जाए। यहाँ की हवाओं में जो ‘बिन-शराब’ का नशा है, वह किसी भी बोतल से ज़्यादा गहरा और स्थायी है। यह प्रकृति का वह प्रेम-प्रसाद है, जिसे महसूस करने के लिए बस एक खुला दिल और जशपुर की फागुनी बयार में खो जाने की चाहत चाहिए।जशपुर के जंगलों की आत्मा और फागुन की उस मादक खुशबू को पकड़ने की कोशिश है।

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