​”होली पर खगोलीय संयोग: 3 मार्च को दिखेगा साल का पहला चंद्र ग्रहण

छत्तीसगढ़ के उत्तरी वनांचल, विशेषकर जशपुर और सरगुजा संभाग में सरहुल का त्योहार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आदिवासियों के जीवन दर्शन का केंद्र है। जब चैत्र के महीने में सूरज की किरणें साल (सखुआ) के घने जंगलों को चीरती हुई धरती पर पड़ती हैं और पेड़ों पर सफेद-पीले फूलों की चादर बिछ जाती है, तब यहाँ की जनजातियाँ, विशेषकर उरांव, मुंडा और कंवर समाज, अपने आराध्य की पूजा के लिए निकल पड़ते हैं। यह वह समय होता है जब पूरा वातावरण सखुआ के फूलों की भीनी-भीनी खुशबू से महक उठता है और जशपुर के ‘लोरो घाट’ से लेकर सरगुजा के ‘मैनपाट’ तक एक नई ऊर्जा का संचार होता है।

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इस पर्व की सबसे पवित्र रस्म गांव के ‘सरना स्थल’ पर संपन्न होती है, जिसे आदिवासियों का सबसे पावन पूजा स्थल माना जाता है। यहाँ गांव के पुजारी, जिन्हें ‘बैगा’ या ‘पहन’ कहा जाता है, साल वृक्ष की विधिवत पूजा करते हैं। आदिवासियों की मान्यता है कि साल के वृक्ष में ही उनकी ‘सरना देवी’ का निवास है, जो पूरे गांव की रक्षा करती हैं और उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। पूजा के दौरान सखुआ के नए फूलों का अर्पण सबसे अनिवार्य होता है, और यह परंपरा इतनी कड़ी है कि जब तक सरना देवी को ये फूल और नई फसल नहीं चढ़ाई जाती, तब तक कोई भी ग्रामीण नए फल या फूलों का स्पर्श तक नहीं करता। यह प्रकृति के प्रति उनके गहरे सम्मान और अनुशासन को दर्शाता है।

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सरहुल के दौरान जशपुर और सरगुजा के गांवों में एक बेहद दिलचस्प परंपरा निभाई जाती है, जो उनके प्राचीन मौसम विज्ञान का हिस्सा है। पूजा की पूर्व संध्या पर बैगा दो नए मिट्टी के घड़ों में जल भरकर सरना स्थल पर रखता है। अगले दिन सुबह पूरे गांव की मौजूदगी में उन घड़ों के पानी के स्तर की जांच की जाती है। यदि पानी का स्तर बना रहता है, तो पाहन भविष्यवाणी करते हैं कि इस वर्ष झमाझम बारिश होगी और फसलें लहलहाएंगी। यह भविष्यवाणी क्षेत्र के किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होती और इसी के आधार पर वे अपनी खेती-किसानी की योजना बनाते हैं।

प्रकृति का महापर्व सरहुल: जब मांदर की थाप पर झूम उठती है धरती और महक उठता है सखुआ-साल

जैसे ही धार्मिक अनुष्ठान पूरे होते हैं, पूरा अंचल उत्सव के रंग में डूब जाता है। मांदल की थाप और नगाड़ों की गूँज हवाओं में तैरने लगती है। पुरुष और महिलाएं अपने पारंपरिक सफेद और लाल रंग के वस्त्र पहनकर ‘जदुर’ और ‘सरहुल’ गीतों पर थिरकने लगते हैं। महिलाएं अपने बालों के जूड़ों में सखुआ के फूल खोंसती हैं, जो उनके श्रृंगार और गौरव का प्रतीक है। शाम ढलते ही बैगा गांव के हर घर के दरवाजे पर जाकर सखुआ के फूल और प्रसाद भेंट करता है, जहाँ घर की महिलाएं उनके पैर धोकर आशीर्वाद लेती हैं। यह रस्म पूरे समाज को आपसी भाईचारे और समरसता के सूत्र में पिरोती है।

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खान-पान के मामले में भी यह पर्व बेहद विशिष्ट है। सरहुल के अवसर पर ‘सूड़ी’ नामक विशेष प्रसाद बनाया जाता है, जो चावल और मांस का एक पारंपरिक मेल होता है, जिसे साल के पत्तों के दोने में परोसा जाता है। इसके साथ ही चावल से बनी ‘हंडिया’ का सेवन आनंद को दोगुना कर देता है। आज के समय में जशपुर और अंबिकापुर जैसे शहरों में निकलने वाली भव्य शोभायात्राएं इस पर्व को एक नया विस्तार दे रही हैं, जहाँ हज़ारों की संख्या में आदिवासी युवा अपनी संस्कृति का प्रदर्शन करते हुए गर्व से चलते हैं। सरहुल हमें सिखाता है कि हम प्रकृति से अलग नहीं हैं, बल्कि हम उसका एक हिस्सा हैं और उसकी रक्षा करना ही हमारा परम धर्म है।

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