सर्दियों की गुनगुनी धूप हो या तपती गर्मियां, छत्तीसगढ़ की माटी को देखकर हमेशा ‘धान का कटोरा’ वाली वो समृद्ध तस्वीर जेहन में उभरती है, जिसे प्रकृति ने घने जंगलों का सुरक्षा कवच और 25 से ज्यादा छोटी-बड़ी नदियों की अविरल धाराएं सौंपकर संवारा है। लेकिन आज इस खूबसूरत तस्वीर के पीछे एक भयानक और कड़वा सच छिपा है। राज्य की लाइफलाइन कही जाने वाली नदियां इस समय अपने अस्तित्व की सबसे दर्दनाक लड़ाई लड़ रही हैं। कहीं इंसानी लालच ने नदियों के सीने पर कंक्रीट का जाल बिछा दिया है, तो कहीं फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले रसायन पानी के रंग को स्याह कर रहे हैं।
अदालतों की सख्त टिप्पणियों और पर्यावरणविदों की गहरी चिंता के बीच छत्तीसगढ़ इस समय एक बेहद संवेदनशील दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ जहां इसकी सबसे बड़ी नदियां इंसानी लापरवाही की भेंट चढ़कर नाले में तब्दील हो रही हैं, वहीं बिलासपुर जिले के एक छोटे से गांव बेलगाहाना से आई ‘जल-क्रांति’ की खबर यह भरोसा दिलाती है कि अगर सामूहिक इच्छाशक्ति जाग जाए, तो सूखी और मर चुकी नदी की रगों में भी दोबारा पानी का संचार किया जा सकता है।
शिवनाथ से खारुन तक फैला प्रदूषण का खतरनाक संजाल
छत्तीसगढ़ की भौगोलिक संरचना मुख्य रूप से दो बड़े हिस्सों—महानदी बेसिन और गोदावरी बेसिन में बंटी हुई है। राज्य की 75 फीसदी से ज्यादा आबादी, कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जैव विविधता इन्हीं पर टिकी है, लेकिन आज यही आधारशिला डगमगा रही है। राजनांदगांव की पहाड़ियों से निकलने वाली 290 किलोमीटर लंबी शिवनाथ नदी, जो महानदी की सबसे बड़ी सहयोगी है, इस समय सबसे गहरे संकट से गुजर रही है। अदालतों में पेश की गई रिपोर्टों और स्थानीय मीडिया की पड़ताल से यह साफ हुआ है कि औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले बिना उपचारित रासायनिक अपशिष्ट और शराब फैक्ट्रियों के कचरे ने शिवनाथ के पानी को पूरी तरह जहरीला बना दिया है, जिससे बड़े पैमाने पर मछलियों और अन्य जलीय जीवों की मौत हो रही है।
यही हाल राजधानी रायपुर की मुख्य नदी खारुन का भी है, जो शहरीकरण की सबसे बड़ी शिकार बनी है। जिस नदी को रायपुर और दुर्ग-भिलाई के लाखों लोगों के लिए स्वच्छ पेयजल का स्रोत होना था, उसमें आज इन बड़े शहरों का घरेलू सीवेज, प्लास्टिक कचरा और फैक्ट्रियों का गंदा पानी सीधे बहाया जा रहा है। हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि हाईकोर्ट को इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को फटकार लगानी पड़ी है। इसके साथ ही बिलासपुर की पहचान मानी जाने वाली अरपा नदी जहां अवैध कब्जों और सीवेज के कारण दम तोड़ रही है, वहीं कोरबा की जीवनरेखा हसदेव नदी पर कोयला खदानों और ताप विद्युत परियोजनाओं से निकलने वाली ‘फ्लाई ऐश’ यानी राख का संकट लगातार गहराता जा रहा है।
जब ‘जुगनी बाई’ के संकल्प से लौट आया घोंघा नदी का खोया हुआ बचपन
इस निराशाजनक माहौल के बीच उम्मीद की सबसे बड़ी और खास कहानी बिलासपुर के बेलगाहाना गांव से निकलकर सामने आती है, जिसे देश के हर उस कोने में पढ़ा जाना चाहिए जहां नदियां सूख रही हैं। यह कहानी है घोंघा नदी की, जो कभी 40 गांवों के अनगिनत परिवारों के लिए आजीविका और जीवन का मुख्य जरिया थी। साल 1980 के दशक में जल संसाधन विभाग द्वारा सिंचाई को बढ़ावा देने के नाम पर इस नदी पर कई चेक डैम बना दिए गए, जिसने अनजाने में नदी के प्राकृतिक प्रवाह को पूरी तरह बदल दिया। जलीय जीवों का आना-जाना बंद हो गया और पानी का तापमान बदलने लगा। रही-सही कसर नदी के जलग्रहण क्षेत्रों में बरसों से चल रहे अवैध पत्थर खनन ने पूरी कर दी, जिसने पानी के मुख्य स्रोतों को ही ब्लॉक कर दिया। नतीजा यह हुआ कि 2000 के दशक के मध्य तक यह बारहमासी नदी पूरी तरह सूखकर एक बंजर लकीर बन गई।
इसी भीषण संकट के बीच बेलगाहाना में एक खामोश क्रांति की चिंगारी भड़की। गांव की महिला स्वयं सहायता समूह की लीडर जुगनी बाई पटेल और उनकी साथी जायसवाल ने सूखी नदी के पथरीले तल पर खड़े होकर यह संकल्प लिया कि वे अपनी इस विरासत को ऐसे खत्म नहीं होने देंगी। उन्होंने जमीनी स्तर पर काम करने वाली संस्था एनपीएन के श्रेयांश बुधिया से संपर्क किया और नदी को पुनर्जीवित करने का एक बड़ा अभियान शुरू किया।
इन महिलाओं ने गांव-गांव जाकर वर्कशॉप कीं, लोगों को जागरूक किया और पत्थर खनन के खिलाफ एक मजबूत माहौल तैयार किया। धीरे-धीरे इस मुहिम को पूरे समुदाय का समर्थन मिलने लगा और ग्रामीणों ने खुद श्रमदान करना शुरू कर दिया। जनता के इस मौन लेकिन शक्तिशाली आंदोलन का असर यह हुआ कि सोते हुए सरकारी महकमे भी जाग उठे। सिंचाई, बागवानी और मत्स्य पालन जैसे विभागों ने बेलगाहाना में आकर कल्याणकारी योजनाएं लागू कीं। इस संयुक्त प्रयास का ऐतिहासिक परिणाम यह निकला कि जो घोंघा नदी पूरी तरह लुप्त घोषित हो चुकी थी, वह आज एक बार फिर कल-कल कर बह रही है।
सांस्कृतिक गौरव और आधुनिक त्रासदी के बीच फंसा अस्तित्व
यह देखना बेहद दिलचस्प और उतना ही पीड़ादायक है कि जिस छत्तीसगढ़ में नदियां सिर्फ जल स्रोत नहीं बल्कि लोक परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं का अटूट हिस्सा हैं, वहां उनके संरक्षण को लेकर इतनी उदासीनता है। एक तरफ हमारे पास राजिम का वो पावन त्रिवेणी संगम है जहां महानदी, पैरी और सोंढूर नदियां मिलकर इसे “छत्तीसगढ़ का प्रयागराज” बनाती हैं, तो दूसरी तरफ बस्तर की इंद्रावती नदी है, जिसका चित्रकोट जलप्रपात अपनी भव्यता के कारण भारत का “नियाग्रा फॉल” कहलाता है। दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी मंदिर के पास डंकिनी और शंखिनी नदी का संगम आज भी आदिवासियों की अनूठी संस्कृति का सबसे बड़ा केंद्र है।
कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के घने जंगलों को सींचने वाली कांगेर नदी हो या उत्तर प्रदेश की ओर बहने वाली रिहंद और कन्हार नदियां, ये सभी राज्य की समृद्ध जैव विविधता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इन नदियों का सूखना या प्रदूषित होना सीधे तौर पर छत्तीसगढ़ की संस्कृति और पहचान पर हमला है।
बेलगाहाना की महिलाओं ने पूरे देश को यह रास्ता दिखाया है कि नदियों को बचाने के लिए बड़े-बड़े सरकारी बजटों या विदेशी तकनीकों से ज्यादा जमीन से जुड़ी इच्छाशक्ति और जनभागीदारी की जरूरत होती है। अगर छत्तीसगढ़ को सचमुच ‘धान का कटोरा’ बनाए रखना है और इसके जंगलों व वन्यजीवों को सुरक्षित रखना है, तो उद्योगों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण पर तुरंत सख्त लगाम लगानी होगी। समय रहते अगर हर शहर और गांव में जुगनी बाई जैसा भगीरथ प्रयास नहीं दोहराया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल पानी का संकट ही नहीं, बल्कि एक मृत सभ्यता विरासत में मिलेगी।


