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छत्तीसगढ़ के उत्तर-पूर्वी छोर पर बसा जशपुर जिला, जिसे पहाड़ों, घने जंगलों और हसीन वादियों का गढ़ माना जाता है, अपनी एक और खास पहचान रखता है—वो है यहां का समृद्ध जल तंत्र। छोटे नागपुर के पठार से घिरे इस पहाड़ी अंचल से निकलने वाली नदियां सिर्फ पानी की धाराएं नहीं हैं, बल्कि ये जशपुर के जंगलों, यहां की आदिम पहाड़ी कोरवा संस्कृति और वन्यजीवों की जीवनरेखा हैं।
लेकिन आज जब पूरे छत्तीसगढ़ में शिवनाथ और खारुन जैसी बड़ी नदियों पर शहरी प्रदूषण की मार पड़ रही है, तो जशपुर की शांत और शीतल नदियां औद्योगिक प्रदूषण से नहीं, बल्कि भूगोलिक बनावट, गाद (Siltation) और मौसम के बदलते मिजाज के एक बेहद संवेदनशील संकट से गुजर रही हैं।
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ईब नदी का घटता जलस्तर और गाद (Siltation) का संकट
जशपुर क्षेत्र की सबसे प्रमुख पहचान है ईब नदी, जो पंडरापाट के पहाड़ों की गोद से निकलकर छत्तीसगढ़ और ओडिशा के लाखों लोगों की जरूरतें पूरी करती है। महानदी बेसिन की इस बेहद महत्वपूर्ण नदी का बचपन जशपुर के वनांचलों में जितना खूबसूरत है, इसका आगे का सफर उतना ही चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
जशपुर में कोई कोयला खदान न होने के बावजूद, ऊपरी इलाकों में जंगलों की कटाई और नदी के जलग्रहण क्षेत्रों (Catchment Areas) में मिट्टी के कटाव के कारण ईब नदी के तल में लगातार गाद (मिट्टी और रेत) जमा हो रही है। पर्यावरणविदों की चिंता है कि इस ‘सिल्टेशन’ के कारण नदी के पानी सोखने और उसे रोके रखने की प्राकृतिक क्षमता साल दर साल कम हो रही है। नदी का पाट उथला हो रहा है, जिससे सर्दियों के खत्म होते ही इसका पानी तेजी से कम होने लगता है और गर्मियों में कई हिस्से लगभग सूख जाते हैं।
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मैनी, दोरकी और शंख नदी: पथरीली बनावट और ‘ड्राई जोन’ की मार
ईब की सहायक नदियां जैसे मैनी, दोरकी, कोकिया, खडुंग और झारखंड की सीमा से लगी शंख नदी जशपुर के ग्रामीण इलाकों की खेती की रीढ़ हैं। चूंकि जशपुर का एक बड़ा हिस्सा पहाड़ी और पथरीला पठारी इलाका है, इसलिए यहां बारिश का पानी टिक नहीं पाता और वह तेजी से बह जाता है। इस वजह से यहां भूजल (Groundwater) का स्तर बेहद नीचे चला जाता है और गर्मी आते ही कई इलाके ‘ड्राई जोन’ में तब्दील होने लगते हैं।
आज जमीनी हकीकत यह है कि जशपुर के कई दूरस्थ वनांचल गांवों के आस-पास के इलाके में जल जीवन मिशन की पाइपलाइनें तो बिछी हैं, लेकिन स्रोत सूखने के कारण ग्रामीणों को आज भी इन पहाड़ी नदियों के मुहाने या झरिया (नदी किनारे रेत में बनाए गए छोटे गड्ढों) के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। नदियों के इस मौसमी सूखे का सीधा असर वनों में रहने वाले आदिवासियों और मवेशियों की सेहत पर पड़ता है।
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जशपुर की इन बरसाती नदियों का एक रूप यह भी है कि मानसून आते ही ये अचानक रौद्र रूप धारण कर लेती हैं। पिछले सालों में खरसोता और कुमकपुरी जैसे गांवों में अचानक आई पहाड़ी बाढ़ की वजह से नदी के बीच टापू पर फंसे ग्रामीणों को सुरक्षित निकालने के लिए जिला प्रशासन और एसडीआरएफ (SDRF) को बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने पड़े थे। छोटे पुल-पुलियों के ऊपर से पानी बहने के कारण दर्जनों गांवों का संपर्क हफ्तों तक जिला मुख्यालय से कट जाता था।
लेकिन इस पुराने दर्द के बीच जशपुर के लिए एक बेहद राहत भरी खबर भी सामने आई है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने जशपुर के विकास को गति देते हुए ‘श्री नदी’ पर एक बड़े और उच्च स्तरीय पुल (High-Level Bridge) के निर्माण को प्रशासनिक मंजूरी दे दी है। यह सिर्फ एक पुल नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा—तीनों राज्यों की कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाला एक लाइफ-चेंजिंग प्रोजेक्ट साबित होने जा रहा है। अब तक बरसात के मौसम में जिस संकरे पुल के डूबने से राहगीरों को जान जोखिम में डालनी पड़ती थी, वहां अब एक सुरक्षित और आधुनिक मार्ग तैयार हो रहा है।
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क्या है जशपुर की नदियों को बचाने का रास्ता?
जशपुर की नदियों को यदि समय से पहले सूखने और अपनी जल-धारिता खोने से बचाना है, तो यहां के समाज को बिलासपुर के बेलगाहाना गांव की ‘घोंघा नदी’ के पुनर्जीवन की भगीरथ गाथा से सीख लेनी होगी। जशपुर के पहाड़ी ढलानों पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना होगा ताकि मिट्टी का कटाव रुके और नदियों में गाद न जमे। साथ ही, नदी के प्राकृतिक सोतों को ब्लॉक करने वाले अवैध उत्खनन पर पूरी तरह रोक लगानी होगी।
समय रहते यदि जशपुर की ईब, मैनी डोड़की श्री नदी और बाकीं जैसी पवित्र नदियों के पानी को सहेजने के लिए स्थानीय स्तर पर ‘वॉटर हार्वेस्टिंग’ और जनभागीदारी नहीं दिखाई गई, तो घने जंगलों से घिरा यह हरा-भरा अंचल भी आने वाले समय में बूंद-बूंद पानी के संकट से घिर जाएगा। पुल और सड़कें तो बन रही हैं, लेकिन इन पुलों के नीचे साल भर अविरल पानी बहता रहे, इसे सुनिश्चित करना आज जशपुर की सबसे बड़ी जरूरत है।


