छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न निवारण (POSH) कानून का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करते हुए एक नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने छत्तीसगढ़ राज्य पाठ्यपुस्तक निगम के तत्कालीन महाप्रबंधक अरविंद कुमार पांडेय के खिलाफ दर्ज यौन उत्पीड़न मामले में पूर्व में गठित आंतरिक शिकायत समिति (ICC) को नियम विरुद्ध करार दिया है। अदालत ने इस अवैध समिति द्वारा की गई संपूर्ण जांच और उसकी रिपोर्ट को निरस्त (शून्य घोषित) करते हुए विधि सम्मत नई समिति गठित कर नए सिरे से निष्पक्ष जांच पूरी करने के निर्देश दिए हैं।
यह मामला मार्च 2022 का है, जब वर्ष 2008 से निगम में कार्यरत एक महिला स्टेनो टाइपिस्ट ने तत्कालीन महाप्रबंधक अरविंद कुमार पांडेय पर दफ्तर में अशोभनीय इशारे करने, अनुचित व्यवहार और आपत्तिजनक प्रस्ताव देने के गंभीर आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद निगम प्रशासन ने आनन-फानन में पांच सदस्यीय आंतरिक शिकायत समिति का गठन कर जांच करवाई थी। हालांकि, पीड़िता ने शुरुआत से ही समिति के गठन पर कड़ा एतराज जताते हुए निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। पीड़िता की दलील थी कि जांच समिति में शामिल सभी सदस्य आरोपी महाप्रबंधक से पद में कनिष्ठ (जूनियर) थे और समिति में एक भी महिला सदस्य को शामिल नहीं किया गया था, जिससे न्यायसंगत जांच संभव ही नहीं थी।
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मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत आंतरिक शिकायत समिति की पीठासीन अधिकारी अनिवार्य रूप से एक वरिष्ठ महिला होनी चाहिए तथा समिति में न्यूनतम 50 प्रतिशत महिला सदस्यों का होना बाध्यकारी है। निगम की इस दलील को अदालत ने पूरी तरह खारिज कर दिया कि विभाग में महिला कर्मियों की कमी के कारण ऐसा किया गया था। कोर्ट ने दो टूक टिप्पणी की कि यदि संबंधित कार्यालय में पर्याप्त महिला कर्मचारी उपलब्ध नहीं थीं, तो नियमानुसार किसी अन्य सरकारी कार्यालय या प्रशासनिक इकाई से वरिष्ठ महिला अधिकारी को समिति में शामिल किया जाना चाहिए था। समिति के मूल गठन को ही गैर-कानूनी पाते हुए हाईकोर्ट ने पुरानी जांच रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में डाल दिया है और अब कानूनी नियमों के तहत नई समिति गठित कर मामले की नए सिरे से निष्पक्ष जांच होगी।

