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छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का अंत: 2000 से 2026 तक संघर्ष, शहादत और समाधान की पूरी कहानी
छत्तीसगढ़ राज्य का जन्म 1 नवंबर 2000 को हुआ था, लेकिन नियति ने इसके साथ ही इसे नक्सलवाद की एक गहरी और पुरानी विरासत भी सौंप दी। बस्तर के जंगलों में शुरू हुआ यह सिलसिला साल 2025 तक आते-आते अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। इन 25 वर्षों में राज्य ने जो झेला है, वह लोकतंत्र और माओवाद के बीच के सबसे भीषण युद्ध की दास्तां है।
चार दशक की जंग के बाद निर्णायक मोड़: बस्तर में माओवाद ढह रहा है, लोकतंत्र मजबूत हो रहा है
खूनी दशक और राजनीतिक शहादत का दौर
राज्य गठन के शुरुआती सालों में नक्सली अपनी जड़ें जमाते रहे, लेकिन 2005 के बाद हिंसा का ग्राफ तेजी से बढ़ा। इस कालखंड की सबसे दुखद और बड़ी घटना 25 मई 2013 को हुई ‘झीरम घाटी कांड’ के रूप में दर्ज है। नक्सलियों ने कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला कर छत्तीसगढ़ के पूरे शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व को खत्म कर दिया। बस्तर के टाइगर कहे जाने वाले महेंद्र कर्मा, प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके पुत्र दिनेश पटेल और वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल सहित 32 लोगों का बलिदान इस राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक क्षति थी। इस घटना ने देश को यह संदेश दिया कि नक्सलवाद केवल एक विचारधारा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के अस्तित्व पर हमला है।
इससे पहले 2010 में ताड़मेटला में सीआरपीएफ के 76 जवानों की शहादत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। 2000 से लेकर अब तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो छत्तीसगढ़ की माटी ने 1300 से अधिक वीर जवानों और 2200 से ज्यादा निर्दोष नागरिकों का खून बहते देखा है।
रणनीति में बदलाव और विकास का प्रहार
साल 2014 के बाद सुरक्षा बलों ने अपनी रक्षात्मक नीति को बदलकर आक्रामक बनाया। सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के सुरक्षित गढ़ माने जाने वाले अबूझमाड़ के भीतर घुसकर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ शुरू की। शासन ने केवल बंदूकों से नहीं बल्कि ‘विश्वास, विकास और सुरक्षा’ के त्रिकोण से प्रहार किया। दंतेवाड़ा से शुरू हुआ ‘लोन वर्राटू’ अभियान एक मील का पत्थर साबित हुआ, जिसके तहत अब तक 5000 से अधिक नक्सलियों ने मुख्यधारा में वापसी की है। 2024 तो मुठभेड़ों और सफलताओं का साल रहा, जिसमें सुरक्षा बलों ने 200 से अधिक इनामी नक्सलियों को ढेर किया, जो पिछले दो दशकों में एक रिकॉर्ड है।
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आंकड़ों की जुबानी संघर्ष का सच
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शहादत: पिछले 25 वर्षों में लगभग 1300+ जवान शहीद हुए।
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नागरिक हत्याएं: नक्सलियों ने मुखबिरी के नाम पर 2200+ ग्रामीणों की जान ली।
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नक्सली सफाया: अब तक 2100+ नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए।
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हथियार छोड़ना: 5000+ नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्यधारा को चुना।
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क्षेत्र का सिमटना: 2000 में जो आतंक 18 जिलों में था, वह 2025 आते-आते सुकमा और बीजापुर जैसे कुछ चुनिंदा इलाकों तक सिमट गया है।
2026: एक नया सूर्योदय
आज शासन का लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है। केंद्र और राज्य सरकार ने मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ को ‘नक्सल मुक्त’ करने का संकल्प लिया है। इसके लिए ‘पिंचिंग रणनीति’ के तहत जंगलों के भीतर फॉरवर्ड कैंप स्थापित किए गए हैं, जिससे नक्सलियों का सप्लाई चैन और सूचना तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। ‘नियद नेल्लानार’ (आपका अच्छा गांव) जैसी योजनाओं से अब उन गांवों तक सड़क, बिजली और इंटरनेट पहुंच रहा है, जहां कभी नक्सलियों का ‘जनताना सरकार’ चलती थी।
25 साल पहले जो राज्य नक्सली हिंसा की पहचान के साथ शुरू हुआ था, वह आज 2026 की दहलीज पर खड़ा होकर शांति और प्रगति का नया अध्याय लिख रहा है। झीरम घाटी के शहीदों और हजारों जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया, क्योंकि बस्तर की वादियों में अब बारूद की गंध नहीं, बल्कि विकास की नई बयार बह रही है।
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