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छत्तीसगढ़।
छत्तीसगढ़ में टमाटर का उत्पादन इस समय भरपूर है। खेतों में फसल लहलहा रही है और मंडियों में रोजाना बड़ी मात्रा में टमाटर की आवक हो रही है। इसके बावजूद टमाटर के दाम आम लोगों की समझ से बाहर बने हुए हैं। आमतौर पर दिसंबर की ठंड में किसान टमाटर औने पौने दाम पर बेचने को मजबूर हो जाते थे और यही वह समय होता था जब उपभोक्ताओं को पांच से दस रुपये किलो तक टमाटर आसानी से मिल जाता था। लेकिन इस साल जनवरी माह में भी टमाटर पचास से साठ रुपये किलो तक बिक रहा है।
हालात ऐसे हैं कि लोगों की रसोई से टमाटर गायब होने लगा है। कई परिवारों का कहना है कि महंगे दामों के कारण वे टमाटर की चटनी तक नहीं बना पा रहे हैं। बाजार में मौजूद टमाटर को देखकर भी लोग हाथ खींच रहे हैं। आम उपभोक्ता यह समझ नहीं पा रहे हैं कि जब उत्पादन भरपूर है तो दाम कम क्यों नहीं हो रहे।
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राज्य के जशपुर अंबिकापुर रायगढ़ महासमुंद दुर्ग और बेमेतरा जैसे जिलों में इस मौसम में बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती होती है। कृषि विभाग के जानकारों के अनुसार इस वर्ष टमाटर का उत्पादन पिछले साल की तुलना में लगभग बीस प्रतिशत अधिक है। इसके बावजूद स्थानीय बाजारों में कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं।
किसानों का कहना है कि खेत से टमाटर दस से पंद्रह रुपये किलो में उठाया जा रहा है। मजबूरी में उन्हें यह दाम स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि टमाटर जल्दी खराब होने वाली फसल है और भंडारण की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। किसान बताते हैं कि खरीद सीधे कोचिये कर रहे हैं जो खेत से टमाटर उठाकर छत्तीसगढ़ से बाहर भेज रहे हैं।
मंडी सूत्रों के मुताबिक प्रतिदिन सैकड़ों टन टमाटर छत्तीसगढ़ से ओडिशा झारखंड मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश भेजा जा रहा है। बाहरी राज्यों में ज्यादा कीमत मिलने के कारण स्थानीय बाजारों में टमाटर की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। इस पूरे कारोबार में कोचियों और बिचौलियों की भूमिका सबसे मजबूत है जो खेत से लेकर खुदरा बाजार तक कीमत तय कर रहे हैं।
इस स्थिति में किसान और उपभोक्ता दोनों ही पिस रहे हैं। किसान को लागत भी नहीं निकल पा रही है जबकि उपभोक्ता महंगे दाम चुकाने को मजबूर है। मुनाफा केवल बीच के व्यापारियों की जेब में जा रहा है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में टमाटर की कोई कमी नहीं है। समस्या पूरी तरह बाजार प्रबंधन और निगरानी की है। यदि सरकार स्थानीय स्तर पर कोल्ड स्टोरेज प्रोसेसिंग यूनिट और सीधे खरीद की व्यवस्था करे तथा बाहर भेजे जाने वाले टमाटर पर निगरानी बढ़ाए तो हालात सुधर सकते हैं।
दिसंबर में सस्ता और सुलभ रहने वाला टमाटर जब जनवरी में भी लाल बना रहे तो यह केवल महंगाई नहीं बल्कि कृषि विपणन व्यवस्था की गंभीर विफलता को उजागर करता है। सवाल सीधा है टमाटर खेत में सस्ता है लेकिन बाजार में महंगा आखिर इसका फायदा कौन उठा रहा है
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