रायपुर।
छत्तीसगढ़ में मानसून की दस्तक हुए हफ्ता बीत चुका है, लेकिन बादलों की बेरुखी ने अन्नदाताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। जून का महीना खत्म होने को है, मगर प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में झमाझम बारिश का इंतजार लगातार लंबा होता जा रहा है। जून के अंतिम सप्ताह तक के सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य के ज्यादातर जिलों में सामान्य से 50 से 80 प्रतिशत तक कम वर्षा दर्ज की गई है। हालात इतने चिंताजनक हैं कि कई क्षेत्रों में जोताई पूरी होने के बाद भी खेतों में इतनी नमी नहीं है कि किसान बोनी का काम शुरू कर सकें।
बारिश की इस भारी कमी का सीधा असर खरीफ फसलों के चालू सीजन पर पड़ता दिखाई दे रहा है। मैदानी इलाकों से लेकर बस्तर के पठार और सरगुजा के पहाड़ी अंचलों तक मानसूनी हवाएं ठंडी पड़ गई हैं। धमतरी, मुंगेली, जांजगीर-चांपा, बलौदाबाजार, महासमुंद, बिलासपुर और राजनांदगांव जिलों में सामान्य से 60 से 80 फीसदी तक कम पानी गिरा है, जिससे खेतों में धूल उड़ रही है। यही हाल आदिवासी बाहुल्य बस्तर, सुकमा, बीजापुर के साथ-साथ उत्तर के जशपुर और सरगुजा जिलों का भी है। इन क्षेत्रों में सावन जैसी झड़ी तो दूर, शुरुआती फुहारों के बाद मानसून पूरी तरह अटक गया है, जिससे धान की नर्सरी यानी थरहा बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
मौसम विज्ञानियों और कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक इस साल प्रदेश में सामान्य से 8-10 फीसदी कम वर्षा होने की आशंका है। जून का कोटा पूरी तरह खाली रहने के कारण अब जुलाई के शुरुआती हफ्तों पर पूरा दारोमदार टिक गया है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि आगामी एक सप्ताह के भीतर जोरदार बारिश नहीं हुई, तो प्रदेश का पूरा खरीफ फसल चक्र बुरी तरह पिछड़ जाएगा।
बदलते मौसम और सूखे की आहट के बीच कृषि विभाग ने किसानों के लिए एडवाइजरी जारी कर वैकल्पिक खेती का रुख करने की अपील की है। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि देर से बोनी की स्थिति में किसान लंबी अवधि वाली फसलों के बजाय 110 से 120 दिनों में पकने वाली धान की कम अवधि की किस्मों का ही चयन करें। इसके साथ ही जिन खेतों में सिंचाई के पुख्ता साधन नहीं हैं, वहाँ धान की जिद छोड़कर किसान अरहर, मूंग, उड़द, सोयाबीन और तिल जैसी फसलों की बोआई करें, जिन्हें बेहद कम पानी की आवश्यकता होती है। विभाग ने सभी किसानों से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ उठाने की भी अपील की है, ताकि मौसम की मार से होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई की जा सके।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सख्त हिदायत देते हुए कहा है कि कोई भी किसान भाई जल्दबाजी में सूखे खेतों में बीज न डाले। जब तक खेतों में कम से कम 3 से 4 इंच तक पानी या पर्याप्त नमी न आ जाए, तब तक बोनी रोकना ही समझदारी है, अन्यथा अंकुरण न होने से महंगे बीज पूरी तरह खराब हो सकते हैं।


