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रायपुर
छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय परंपराओं, जल-जंगल-जमीन से जुड़े जीवन मूल्यों और बच्चों-किशोरों के सुरक्षित भविष्य को लेकर राजधानी रायपुर में दो दिवसीय राष्ट्रीय क्षेत्रीय कार्यशाला ‘मूल मंथन: आदिवासी ज्ञान से किशोरावस्था की पुनर्कल्पना’ का आयोजन किया गया। राज्य शासन के आदिम जाति विकास विभाग और यूनिसेफ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस मंथन में देशभर के नीति-निर्माताओं, विशेषज्ञों और जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य प्रदेश की 31 प्रतिशत से अधिक जनजातीय आबादी, विशेषकर बच्चों और किशोर-किशोरियों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और समग्र विकास के लिए ठोस रणनीति तैयार करना था।
सांस्कृतिक धरोहरों को बचाना सबसे बड़ी चुनौती: सोनमणि बोरा
आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने संबोधन में कहा कि छत्तीसगढ़ में निवास करने वाली 43 जनजातियों का संपूर्ण जीवन प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। आधुनिकता के इस दौर में इन अनमोल सांस्कृतिक धरोहरों, परंपराओं और मौलिक जीवन मूल्यों को सुरक्षित रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
उन्होंने बताया कि बस्तर सहित सभी वनांचल क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में लगातार सुधार हो रहा है। कार्यशाला से निकले सुझावों के आधार पर ही भविष्य की जनकल्याणकारी योजनाओं का खाका तैयार किया जाएगा।
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सामुदायिक नेतृत्व और विश्वास से आएगा बदलाव
कार्यक्रम के समापन सत्र में वक्ताओं ने रेखांकित किया कि जनजातीय क्षेत्रों में किसी भी योजना की सफलता के लिए स्थानीय समुदाय का विश्वास और नेतृत्व बेहद जरूरी है। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने कहा कि जनजातीय समाज के साथ पूर्ण सम्मान, संवेदनशीलता और आपसी समन्वय के जरिए ही स्थायी और सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

