झारखंड का बेहद खूबसूरत और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर गुमला जिला आखिरकार 35 साल लंबे लाल आतंक के साए से पूरी तरह आजाद हो गया है। 1990 के दशक में जिस नक्सलवाद ने इस शांत और आदिवासी संस्कृति वाले इलाके को हिंसा की आग में झोंक दिया था, वह साल 2025 में गुमला के ‘नक्सलमुक्त’ घोषित होने और अब 21 मई 2026 को बचे-खुचे बड़े नक्सलियों के सरेंडर के साथ पूरी तरह इतिहास बन चुका है।
इस खौफनाक दौर की शुरुआत 1990 के शुरुआती वर्षों में हुई थी, जब गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और सरकारी योजनाओं की कमी के कारण ग्रामीणों और आदिवासी युवाओं में गहरा असंतोष था। नक्सली संगठनों ने इसी नाराजगी का फायदा उठाया और जल, जंगल, जमीन के अधिकारों का मुद्दा उठाकर स्थानीय लोगों के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर ली। बिशुनपुर, चैनपुर और घाघरा के घने जंगलों तथा दुर्गम पहाड़ी इलाकों ने नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकानों का काम किया, जहां पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ से भी उग्रवादियों को पनाह मिलती रही। साल 2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद भी यह बदहाली खत्म नहीं हुई; भाकपा माओवादी, पीएलएफआई और जेजेएमपी जैसे संगठनों ने लेवी वसूली, बम धमाकों, पुलिस स्टेशनों और सड़क निर्माण कार्यों को निशाना बनाकर दहशत का राज कायम रखा।
ऑपरेशन क्लीन और सरकार की नीति से टूटी कमर
गुमला को इस खौफ से बाहर निकालने के लिए झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ और सुरक्षा बलों ने एक बेहद सटीक रणनीति पर काम किया। आधुनिक तकनीक और खुफिया इनपुट के जरिए जंगलों में चौतरफा सर्च ऑपरेशन चलाए गए, जिससे कई बड़े कमांडर मुठभेड़ों में मारे गए। इसके साथ ही सरकार की आकर्षक पुनर्वास और आत्मसमर्पण नीति ने नक्सलियों को यह अहसास कराया कि बंदूक छोड़कर मुख्यधारा में लौटने पर ही उनका और उनके परिवार का भविष्य सुरक्षित है। इस लगातार कार्रवाई का ऐतिहासिक परिणाम यह रहा कि साल 2025 में गुमला को आधिकारिक रूप से ‘नक्सलमुक्त’ घोषित कर दिया गया और वहां से सीआरपीएफ की बटालियनों को हटा लिया गया।
रांची में महा-सरेंडर और जेजेएमपी का पूरी तरह सफाया
इस शांति अभियान को अंतिम और सबसे बड़ी कामयाबी गुरुवार, 21 मई 2026 को रांची में मिली, जहां नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत एक साथ 27 उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। गुमला जिले के लिए सबसे बड़ी राहत की बात यह रही कि इस महा-सरेंडर में जेजेएमपी संगठन के दो सबसे बड़े चेहरे—सबजोनल कमांडर सचिन बेक और एरिया कमांडर श्रवण गोप—शामिल थे, जो लंबे समय से पुलिस के लिए सिरदर्द बने हुए थे। गुमला के पुलिस अधीक्षक हारीश बिन जमा ने गर्व से दावा किया है कि इन दोनों के आत्मसमर्पण के बाद अब गुमला जिले से जेजेएमपी का प्रभाव पूरी तरह खत्म हो चुका है और जिला शत-प्रतिशत नक्सलमुक्त हो गया है।
एक नजर बदलाव पर: जहां पहले गुमला के जंगलों में बारूद की गंध, मुठभेड़ का डर और लेवी की वजह से ठप पड़े विकास कार्य दिखाई देते थे, वहीं आज का गुमला शांति और सुकून से सांस ले रहा है। अब सुदूर गांवों तक पक्की सड़कें, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंच रही हैं। प्रशासन का भी यही मानना है कि बंदूक की जगह विकास और आपसी विश्वास के जरिए ही इस समस्या को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है। मुख्यधारा में लौटे सभी उग्रवादियों को अब पुनर्वास नीति का लाभ देकर सामान्य जीवन में वापस लाया जा रहा है।


