सूरजपुर जिले के सरकारी स्कूलों में वर्षों से चली आ रही संलग्नीकरण यानी अटैचमेंट व्यवस्था पर शिक्षा विभाग ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और कार्यालयों में जमी जमावट के मुद्दे बाद विभाग ने 92 शिक्षकों एवं कर्मचारियों का संलग्नीकरण समाप्त कर दिया है। इससे पहले प्रथम चरण में 127 कर्मचारियों का अटैचमेंट निरस्त किया जा चुका है। लगातार हो रही इस बड़ी कार्रवाई को जिले की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव माना जा रहा है।
क्यों जरूरी था यह कदम
ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय से अभिभावक शिकायत दर्ज करा रहे थे कि सरकारी कागजों में तो स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक दर्ज हैं लेकिन जमीनी हकीकत में कक्षाएं गिने चुने शिक्षकों के भरोसे ही चल रही थीं। शिक्षकों की कमी के कारण दर्जनों शिक्षक मूल स्कूलों के बजाय कार्यालयों या अन्य संस्थानों में संलग्न थे जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों की पढ़ाई का भारी नुकसान हो रहा था। कई स्कूलों में तो विषयों के शिक्षक ही उपलब्ध नहीं थे।
आदेश के बाद भी उठ रहे सवाल: निगरानी की सख्त जरूरत
कार्रवाई के बीच यह बात भी सामने आ रही है कि प्रेमनगर सहित कुछ विकासखंडों में कुछ व्याख्याता और कर्मचारी आदेश जारी होने के बाद भी अपने मूल विद्यालयों में कार्यभार ग्रहण करने से कतरा रहे हैं। चर्चा है कि कई कर्मचारी अब भी जिला मुख्यालय में रहकर कार्य कर रहे हैं और वहीं से वेतन आहरण कर रहे हैं। ऐसे में यदि इन तथ्यों की पुष्टि होती है तो यह स्पष्ट है कि केवल आदेश जारी करना काफी नहीं होगा बल्कि आदेश के शत प्रतिशत पालन की निगरानी भी उतनी ही आवश्यक है।
पूरे जिले के अभिभावकों ग्रामीणों और शिक्षा जगत की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह नियम सभी पर समान रूप से लागू होगा या कुछ रसूखदारों को छूट मिलती रहेगी। बिना किसी भेदभाव के कड़ाई से आदेश का पालन होने पर ही हजारों विद्यार्थियों को इसका सीधा लाभ मिल सकेगा।
अब परीक्षा कर्मचारियों की
संलग्नीकरण समाप्त करने के बाद असली परीक्षा अब उन शिक्षकों और कर्मचारियों की है जिन्हें अपने मूल स्कूलों में लौटकर यह साबित करना होगा कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ कागजी आदेशों से नहीं बल्कि उनकी नियमित उपस्थिति और निष्ठापूर्वक अध्यापन से पूरी होगी।
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