धर्म एवं संस्कृति डेस्क
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाता है, जिसे लोक भाषा में आखा तीज भी कहते हैं। वैदिक शास्त्रों के अनुसार अक्षय तृतीया एक अत्यंत शुभ और अबूझ मुहूर्त है, जिसका अर्थ है कि इस दिन किसी भी मांगलिक कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती। इस वर्ष वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का आरंभ 19 अप्रैल को प्रातः 10:50 बजे से होगा और यह तिथि अगले दिन यानी 20 अप्रैल को प्रातः 7:28 बजे समाप्त होगी। उदय तिथि और ज्योतिषीय गणना के अनुसार अक्षय तृतीया का मुख्य पर्व 19 अप्रैल को ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया पर किया गया कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल प्रदान करता है, जिसका पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। यही कारण है कि यह दिन विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और नए व्यापार की शुरुआत के लिए विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है। इसके अतिरिक्त इस दिन खरीदारी करने, विशेषकर सोना या चांदी लेने से माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख है कि इसी पवित्र तिथि को माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं।
साथ ही, सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग जैसे महान युगों की शुरुआत भी इसी दिन से मानी जाती है।
अक्षय तृतीया की पूजा विधि के अनुसार इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करना चाहिए। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा को एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर स्थापित किया जाता है। पूजन के दौरान रोली, चंदन, हल्दी और कुमकुम का तिलक लगाकर भगवान विष्णु को पीले पुष्प और देवी लक्ष्मी को कमल या गुलाबी पुष्प अर्पित किए जाते हैं। नैवेद्य के रूप में जौ या गेहूं का सत्तू, ऋतु फल, मिठाइयां और भीगे हुए चने चढ़ाना अत्यंत शुभ माना गया है। पूजा के दौरान विष्णु सहस्रनाम का पाठ और अक्षय तृतीया की कथा सुनने का विशेष महत्व है।
पूजा के समापन पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती की जाती है और इसके पश्चात अपनी सामर्थ्य के अनुसार गरीबों, ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान दिया जाता है। दान में मुख्य रूप से अन्न, वस्त्र, जल का कलश, फल और दक्षिणा शामिल होती है। अक्षय तृतीया का दिन उत्तराखंड की प्रसिद्ध चार धाम यात्रा के लिए भी मील का पत्थर है, क्योंकि इसी दिन गंगोत्री और यमुनोत्री धामों के कपाट खोले जाते हैं। इस प्रकार यह पर्व धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से नई शुरुआत और अटूट समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

