रेलवे में भृत्य के पद पर नौकरी लगाने के नाम पर ठगी के फरार आरोपी को थाना जयनगर पुलिस ने किया गिरफ्तार
क्षेत्रीय ब्यूरो:
मसीही समाज के लिए आत्मिक नवीनीकरण और प्रभु यीशु के बलिदान को स्मरण करने का पावन समय ‘लेंट’ यानी ‘चालीसा काल’ का शुभारंभ हो चुका है।
‘ऐश वेडनेसडे’ यानी राख बुधवार से शुरू हुई यह 40 दिनों की आध्यात्मिक यात्रा ईस्टर संडे तक जारी रहेगी। इस विशेष अवधि को छोटा नागपुर, जशपुर और सरगुजा के आदिवासी अंचलों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार ‘चालीसा’ के नाम से जाना जाता है, जहाँ मसीही विश्वासी प्रार्थना, उपवास और दान-पुण्य के माध्यम से ईश्वर के सामीप्य की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
ऑल द बेस्ट, प्यारे बच्चों: सीएम विष्णु देव साय ने परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों को दिया आत्मविश्वास और सफलता का संदेश
बाइबल के उल्लेखों के अनुसार, जिस प्रकार प्रभु यीशु ने अपने लोक-सेवा के कार्यों से पूर्व मरुस्थल में 40 दिनों तक कठिन उपवास और प्रार्थना की थी, उसी आदर्श को आधार मानकर श्रद्धालु इस समय को आत्म-निरीक्षण और पश्चाताप के रूप में मनाते हैं।
,,अब शिक्षा की कमान संभालेंगे ‘Frontier AI’ मॉडल! जानिए क्या बदलेगा क्लासरूम में…?
इस काल की महत्ता इसी बात से समझी जा सकती है कि इसमें रविवार को उपवास की गिनती से मुक्त रखा गया है, क्योंकि प्रत्येक रविवार को प्रभु के पुनरुत्थान के उत्सव के रूप में देखा जाता है।
क्षेत्रीय बोलियों जैसे नागपुरी और कुड़ुख मिश्रित समाज में बुजुर्ग इसे ‘उपवास कर दिन’ या ‘रोजा के दिन’ के रूप में भी संबोधित करते हैं, जो इस पर्व की स्थानीय जड़ों की गहराई को दर्शाता है।
पिठारू कांदा: छत्तीसगढ़ के जंगलों का ‘प्राकृतिक उपहार’ और आदिवासियों का पारंपरिक स्वाद
इस दौरान श्रद्धालुओं की जीवनशैली में एक विशिष्ट संयम देखने को मिलता है। उपवास केवल भोजन के त्याग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ‘आध्यात्मिक उपवास’ है जिसमें लोग मांस-मदिरा, विलासिता और सोशल मीडिया जैसे आधुनिक आकर्षणों को त्यागकर अपना ध्यान प्रभु के ‘दुखभोग’ पर केंद्रित करते हैं।
“RTE एडमिशन 2026-27: पहले चरण का रजिस्ट्रेशन शुरू, 31 मार्च तक कर सकेंगे आवेदन”


