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रायपुर : भारतीय रेलवे के प्रशासनिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है, जिसका सीधा असर छत्तीसगढ़ के रेल नेटवर्क पर पड़ेगा। आगामी 1 जून से नया ‘रायगड़ा रेल मंडल’ पूरी तरह अस्तित्व में आने जा रहा है। इस नए बदलाव के बाद प्रसिद्ध केके (कोट्टावलसा-किरंदुल) रेल लाइन पूरी तरह से इसी नए मंडल के अधीन संचालित होगी। रेलवे के इस नए नक्शे में बस्तर की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ती हुई दिखाई दे रही है, जिससे इस नक्सल प्रभावित और जनजातीय क्षेत्र में रेल सुविधाओं के विस्तार को एक नई गति मिलने की उम्मीद है।
नए रेल मंडल की कमान सौंपने से पहले रेल अधिकारियों ने रायगड़ा नियंत्रण कार्यालय और वहां की संचालन व्यवस्था का बारीकी से निरीक्षण किया है और सभी तैयारियों की अंतिम समीक्षा पूरी कर ली है।
केके लाइन का दोहरीकरण और बस्तर को नई उम्मीदें
रेलवे विशेषज्ञों और अधिकारियों का मानना है कि केके रेल लाइन के दोहरीकरण (Double-line track) का काम पूरा होने और नए प्रशासनिक ढांचे (रायगड़ा मंडल) के गठन के बाद बस्तर क्षेत्र को नई यात्री ट्रेनों और बेहतर माल ढुलाई की सुविधाएं मिल सकेंगी। बस्तर लंबे समय से बुनियादी रेल सुविधाओं के लिए संघर्ष करता रहा है, ऐसे में इस भौगोलिक और प्रशासनिक फेरबदल को क्षेत्र के विकास के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
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रायपुर रेल मंडल से जोड़ने की मांग अब भी अधूरी
इस सकारात्मक बदलाव के बावजूद स्थानीय स्तर पर एक कसक और नाराजगी अब भी बरकरार है। दरअसल, सालों पुरानी ‘दल्लीराजहरा-रावघाट-जगदलपुर’ रेल परियोजना पर काम चलने के बावजूद बस्तर को छत्तीसगढ़ की राजधानी यानी रायपुर रेल मंडल से सीधे जोड़ने की मांग अब तक अधूरी है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नागरिकों का कहना है कि बस्तर क्षेत्र रेलवे को हर साल करोड़ों रुपये का भारी-भरकम राजस्व (Revenue) देता है। लौह अयस्क (Iron Ore) की ढुलाई से रेलवे को होने वाली मोटी कमाई को देखते हुए यह बेहद जरूरी है कि बस्तर को ओडिशा या आंध्र प्रदेश के मंडलों के भरोसे छोड़ने के बजाय सीधे छत्तीसगढ़ के अपने रेल ढांचे (रायपुर या बिलासपुर मंडल) से जोड़ा जाए, ताकि राज्य के भीतर कनेक्टिविटी मजबूत हो सके।
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उपेक्षा का शिकार जशपुर: रेलवे के नक्शे से पूरी तरह गायब
एक तरफ जहां नए प्रशासनिक फेरबदल में बस्तर को तवज्जो मिल रही है, वहीं छत्तीसगढ़ का एक और प्रमुख जनजातीय जिला ‘जशपुर’ आज भी रेलवे के नक्शे से पूरी तरह गायब है। आजादी के दशकों बाद भी जशपुर जिला मुख्यालय तक रेल की सीटी नहीं पहुंच पाई है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि हर बार बजट और रेलवे के नए नक्शों में जशपुर की उपेक्षा की जाती है। जिले में रेल नेटवर्क न होने के कारण न केवल उद्योगों का विकास रुका हुआ है, बल्कि स्थानीय युवाओं को रोजगार और उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों में जाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। जशपुरवासियों की मांग है कि सरकार और रेलवे प्रशासन बस्तर की तर्ज पर जशपुर को भी रेल नेटवर्क से जोड़ने के लिए ठोस कदम उठाए, ताकि इस सीमावर्ती जिले का भी तेजी से विकास हो सके।
जशपुर के रेल नक्शे से गायब रहने की यह कहानी असल में ‘कोरबा-लोहरदगा रेल मार्ग’ की पुरजोर मांग, कागजी सर्वे और फिर राजनीतिक वादों के ठंडे बस्ते में चले जाने की एक कड़वी और अंतहीन दास्तान है। दशकों से जशपुर के लोग इस उम्मीद में जी रहे हैं कि कब कोरबा से पत्थलगांव और जशपुर होते हुए झारखंड के लोहरदगा तक रेल लाइन बिछेगी, जिससे छत्तीसगढ़ सीधे पड़ोसी राज्य से जुड़ जाएगा। इस बहुप्रतीक्षित रूट के लिए कई बार जन-आंदोलन हुए, जिसके दबाव में आकर बकायदा रेलवे द्वारा सर्वे भी कराया गया। इस सर्वे की मंजूरी ने आदिवासियों और स्थानीय लोगों की उम्मीदों को पंख दिए थे कि अब उनके अंचल की किस्मत बदलने वाली है।
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लेकिन विडंबना देखिए कि जैसे ही सर्वे की यह भारी-भरकम फाइलें दिल्ली और बिलासपुर के रेलवे मंत्रालयों और दफ्तरों में पहुंचीं, वे हमेशा की तरह कछुआ गति, बजट की कमी और प्रशासनिक उदासीनता के गहरे ठंडे बस्ते में दफन होकर रह गईं। नेताओं के चुनावी घोषणापत्रों में तो यह रेल लाइन खूब दौड़ती है, लेकिन हकीकत के धरातल पर आज तक एक इंच पटरी भी नहीं बिछ सकी है। खनिज संपदा और प्राकृतिक खूबसूरती से भरपूर होने के बावजूद इस सीमावर्ती जिले को सिर्फ आश्वासन का झुनझुना थमाया गया है। सालों-साल बीत जाने के बाद अब जनता का सब्र पूरी तरह टूट रहा है, और आज हर जशपुरवासी के जेहन में शासन से बस एक ही सुलगता और तीखा सवाल है कि आखिर इस जनजातीय अंचल के साथ यह सौतेला व्यवहार कब बंद होगा? कब उनका यह बरसों पुराना रेल सपना हकीकत बनेगा और कब जशपुर की वादियों में सचमुच रेल की सीटी गूंजेगी?
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