बिलासपुर:
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने सर्विस टैक्स की बकाया वसूली से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रोपराइटरशिप फर्म के मालिक की मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिसों से मृतक की कर देनदारी वसूलने के लिए रिकवरी या गार्निशी नोटिस जारी नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब संबंधित कानून में ऐसा कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान नहीं है, तब ऐसी कार्रवाई कानून की कसौटी पर नहीं टिक सकती।
यह फैसला न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ ने भिलाई निवासी देवन अनीषा की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
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क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता के पति स्वर्गीय महेंद्रन रूपेश नायडू ‘एम/एस महेंद्रन रूपेश नायडू’ नाम से प्रोपराइटरशिप फर्म चलाकर सब-कॉन्ट्रैक्टर के रूप में कार्य करते थे। विभाग ने वित्तीय वर्ष 2013-14 के लिए नोटिस जारी कर 30 जून 2020 को ₹10.74 लाख से अधिक का सर्विस टैक्स और उतनी ही राशि का जुर्माना निर्धारित किया था। इसके खिलाफ दायर अपील खारिज हो गई थी।3 मई 2023 को करदाता महेंद्रन रूपेश नायडू का निधन हो गया। इसके बाद जीएसटी एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग ने 13 दिसंबर 2024 को उनकी पत्नी (कानूनी वारिस) और उनके बैंक खातों के खिलाफ फाइनेंस एक्ट और सीजीएसटी एक्ट के तहत गार्निशी व रिकवरी नोटिस जारी कर दिया।
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वरिष्ठ अधिवक्ता नीलाभ दुबे ने तर्क दिया कि प्रोपराइटरशिप फर्म की अलग से कोई कानूनी पहचान नहीं होती। मालिक की मृत्यु के बाद फाइनेंस एक्ट के तहत उसके वारिसों से टैक्स वसूली का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। विभाग की ओर से तर्क दिया गया कि टैक्स की मांग और आदेश मालिक के जीवित रहते ही पारित हो चुका था, इसलिए बकाया राशि की वसूली वारिसों से की जा सकती है।
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हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘शबीना अब्राहम बनाम कलेक्टर ऑफ सेंट्रल एक्साइज एंड कस्टम्स’ मामले का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि सेंट्रल एक्साइज एक्ट और फाइनेंस एक्ट में मृत करदाता की देनदारी उसके कानूनी वारिसों से वसूलने के लिए आवश्यक वैधानिक प्रावधान नहीं है।
अदालत ने 13 दिसंबर 2024 को जारी गार्निशी व रिकवरी नोटिस को निरस्त कर दिया और विभाग को निर्देश दिया कि मृतक की सर्विस टैक्स देनदारी के लिए वारिसों के खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए।


