बिलासपुर हाई कोर्ट ने पेंशन निर्धारण को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की पेंशन पात्रता उसकी सेवानिवृत्ति की तारीख पर लागू नियमों के अनुसार ही तय की जाएगी। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि बाद में लागू किए गए किसी भी संशोधित नियम या परिपत्र का लाभ पूर्वव्यापी (पिछली तारीख से) रूप से तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक कि उन नियमों में इसका कोई स्पष्ट और वैधानिक प्रावधान न हो। पेंशन संबंधी अधिकार कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने वाले दिन ही फ्रीज यानी निर्धारित हो जाते हैं, जिन्हें बाद के नीतिगत बदलावों के आधार पर बदला नहीं जा सकता।
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यह अहम टिप्पणी जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) के पूर्व अध्यक्ष और राज्य के पूर्व मुख्य सचिव आरएस विश्वकर्मा की याचिका को खारिज करते हुए की। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि उन्हें संशोधित सेवा नियमों के आधार पर अतिरिक्त पेंशन का लाभ दिया जाए और साल 2020 में जारी की गई अधिसूचना को पिछली तारीख से प्रभावी माना जाए। मामले के तथ्यों के अनुसार, आरएस विश्वकर्मा 16 जनवरी 2017 को सीजीपीएससी अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए थे, जबकि सरकार द्वारा संशोधित नियम एक अप्रैल 2018 से प्रभावी किए गए थे। इसी समयावधि के अंतर को देखते हुए कोर्ट ने उन्हें संशोधित पेंशन संरचना के तहत किसी भी प्रकार का अतिरिक्त लाभ पाने के लिए अपात्र माना।
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इस पूरे मामले का मुख्य विवाद छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सेवा शर्तें) विनियम, 2001 के विनियम 8(3) के तहत अधिकतम संयुक्त पेंशन सीमा को लेकर था। दरअसल, विश्वकर्मा पहले से ही मुख्य सचिव पद से सेवानिवृत्ति के बाद 11.59 लाख रुपये वार्षिक पेंशन प्राप्त कर रहे थे, जबकि उस समय के नियमों के अनुसार पीएससी अध्यक्ष के लिए अधिकतम संयुक्त पेंशन सीमा केवल 4.80 लाख रुपये निर्धारित थी। इसी तकनीकी कारण से उन्हें आयोग में बिताए गए सेवाकाल के लिए कोई अतिरिक्त पेंशन नहीं मिल सकी थी, हालांकि बाद में 5 दिसंबर 2020 की एक अधिसूचना के जरिए सरकार ने इस वार्षिक सीमा को बढ़ाकर 13.50 लाख रुपये कर दिया था।
याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी थी कि चूंकि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें देश में एक जनवरी 2016 से लागू की गई थीं, इसलिए संशोधित पेंशन नियमों को भी उसी तारीख से प्रभावी माना जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने आयोग के एक अन्य पूर्व सदस्य एमएस पैकरा के मामले का हवाला देते हुए अपने साथ भेदभाव होने का आरोप भी लगाया था। अदालत ने इस दलील को पूरी तरह से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि दोनों मामलों की परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं, क्योंकि पैकरा की पेंशन तत्कालीन वैधानिक सीमा के भीतर थी, जबकि विश्वकर्मा की पेंशन पहले से ही तय सीमा से काफी अधिक थी। कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि वित्तीय नीतियां बनाना और किसी नियम के लिए कट-ऑफ डेट (प्रभावी तिथि) तय करना पूरी तरह से सरकार का नीतिगत अधिकार है, और जब तक कोई असाधारण परिस्थिति न हो, न्यायालय ऐसे सरकारी फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।


