नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR – Special Intensive Revision) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बुधवार को एक बेहद अहम फैसला सुनाया। अदालत ने साफ किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए एसआईआर (SIR) बेहद जरूरी है और यह पूरी तरह से चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है।

​मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने 29 जनवरी को इस मामले में लंबी सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे बुधवार को सुनाया गया।

​कोर्ट के फैसले की 3 बड़ी बातें

  • एसआईआर प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक: पीठ ने कहा कि मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण कराना चुनाव आयोग का वैधानिक अधिकार है। आयोग ने अपनी शक्तियों का कोई दुरुपयोग नहीं किया और न ही नियमों के खिलाफ जाकर किसी मतदाता का नाम काटा गया है।
  • संविधान और कानून से मिली शक्ति: अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत चुनाव आयोग को एसआईआर कराने की पूरी शक्ति मिली हुई है। आयोग ने अपनी सीमाओं से बाहर जाकर कोई काम नहीं किया है।
  • नागरिकता की जांच का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने एक और बड़ा स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची के उद्देश्य के लिए नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच करने का वैधानिक अधिकार (प्रतिनिधि कानून की धारा 16 के तहत) है। हालांकि, आयोग यह तय नहीं कर सकता कि कौन भारतीय नागरिक है या नहीं, लेकिन यदि कोई व्यक्ति शर्तें पूरी नहीं करता, तो आयोग उसे सक्षम प्राधिकारी के पास भेज सकता है। नाम हटाने का अंतिम फैसला सक्षम प्राधिकारी का ही होगा।

​क्या था पूरा विवाद और याचिकाकर्ताओं की दलील?

​यह विवाद पिछले साल जून में तब शुरू हुआ था जब चुनाव आयोग ने बिहार में एसआईआर अभियान शुरू किया था। बाद में इसे पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु समेत कई राज्यों में बढ़ा दिया गया। इसके खिलाफ ‘लोकतांत्रिक सुधार संघ’ (ADR), योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा, मनोज झा, केसी वेणुगोपाल और सुप्रिया सुले जैसे बड़े नेताओं व संगठनों ने याचिकाएं दायर की थीं।

विवाद की मुख्य वजह:

याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग की उस शर्त पर आपत्ति थी, जिसके तहत जिन मतदाताओं के नाम 2002 या 2003 की मतदाता सूची में नहीं थे, उन्हें उस सूची में शामिल किसी व्यक्ति से अपना पारिवारिक संबंध साबित करना था।

याचिकाकर्ताओं का दावा: इस शर्त के कारण गरीब, प्रवासी और हाशिए पर रहने वाले लोग वोटिंग के अधिकार से वंचित हो सकते हैं, क्योंकि उनके पास इतने पुराने दस्तावेजी सबूत मिलना बेहद मुश्किल है।

 

​चुनाव आयोग का पक्ष और कोर्ट का अंतरिम निर्देश

​सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने दलील दी कि मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध, त्रुटिरहित और फर्जी वोटरों से मुक्त रखने के लिए यह अभियान बेहद जरूरी है।

​अदालत ने प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने और प्रभावित मतदाताओं को राहत देने के लिए अंतरिम निर्देश भी जारी किए। शुरुआत में चुनाव आयोग ने सत्यापन के लिए 11 दस्तावेज तय किए थे, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पहचान के अन्य वैध सरकारी दस्तावेजों को भी इस प्रक्रिया में शामिल कर राहत दी गई थी। अदालत ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि यह प्रक्रिया ‘लाल बाबू हुसैन’ मामले के फैसले का उल्लंघन करती है।

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