राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने देश के कई राज्यों में लापता होने वाले व्यक्तियों, विशेषकर बच्चों की बढ़ती संख्या और उन्हें ढूंढने की धीमी रफ्तार पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने इस स्थिति को मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना है और बिहार, ओडिशा, तेलंगाना, महाराष्ट्र और राजस्थान के मुख्य सचिवों व पुलिस महानिदेशकों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के आधार पर यह चिंता जताई गई है कि इन राज्यों में मानव तस्करी का जाल लगातार फैल रहा है, जिससे हजारों परिवारों का भविष्य अंधकारमय हो गया है।
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आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि मानव तस्करी के सबसे अधिक मामले इन्हीं पांच राज्यों में दर्ज किए गए हैं, जिनमें ओडिशा नाबालिग लड़कों की तस्करी के मामले में पूरे देश में शीर्ष पर बना हुआ है और बिहार इस सूची में दूसरे स्थान पर है। वहीं, नाबालिग लड़कियों की तस्करी के सबसे ज्यादा और डरावने मामले राजस्थान से सामने आए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से आयोग ने यह आशंका जताई है कि लापता होने वाले इन बच्चों को भीख मांगने, बाल श्रम, वेश्यावृत्ति और अन्य अवैध आपराधिक गतिविधियों के दलदल में धकेला जा रहा है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए अत्यंत चिंताजनक स्थिति है।
विशेष रूप से बिहार की स्थिति पर गौर करें तो वर्ष 2013 से वहां हर साल औसतन बारह हजार से चौदह हजार व्यक्ति लापता हो रहे हैं, जिनमें से केवल दो-तिहाई बच्चों का ही अब तक पता लगाया जा सका है। आयोग ने राज्य सरकारों से उन कदमों का विवरण मांगा है जो इन बच्चों की सुरक्षा और उनकी बरामदगी के लिए उठाए गए हैं या प्रस्तावित हैं। साथ ही, आयोग ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो से भी इन पांच राज्यों की नवीनतम स्थिति पर रिपोर्ट मांगी है ताकि इस संकट की गहराई को समझा जा सके और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।

