नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने ओडिशा के जनजातीय समाज और उनकी भाषाई पहचान से जुड़े दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर लोकसभा में अपनी स्थिति स्पष्ट की है। जनजातीय कार्य राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके ने सदन को सूचित किया कि ओडिशा सरकार की ओर से झोड़िया समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में ‘परोजा’ के पर्याय के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव मिला था। हालांकि, भारत के महापंजीयक (ORGI) ने इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया है, जिसके बाद केंद्र ने मामले को अतिरिक्त जानकारी और समीक्षा के लिए पुनः राज्य सरकार को वापस भेज दिया है।
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इस प्रक्रिया की जटिलता को समझाते हुए मंत्री महोदय ने बताया कि किसी भी समुदाय को ST सूची में शामिल करना एक बहुस्तरीय संवैधानिक प्रक्रिया है। इसके लिए राज्य सरकार को नृवंशविज्ञान रिपोर्ट भेजनी होती है, जिसकी गहन जाँच पहले आरजीआई (RGI) कार्यालय और फिर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) द्वारा की जाती है। यदि आरजीआई किसी प्रस्ताव पर असहमति जताता है, तो राज्य सरकार को उन बिंदुओं पर अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है, इसीलिए कई प्रस्ताव वर्तमान में विभिन्न स्तरों पर लंबित हैं।
दूसरी ओर, संविधान की आठवीं अनुसूची में सौरा (सोरा) भाषा को शामिल करने की मांग पर भी गृह मंत्रालय की ओर से स्थिति स्पष्ट की गई। सरकार ने स्वीकार किया कि सौरा सहित कई अन्य भाषाओं को संवैधानिक दर्जा देने के अनुरोध समय-समय पर प्राप्त होते रहे हैं। हालांकि, इसके मार्ग में सबसे बड़ी बाधा किसी ‘निश्चित मानदंड’ का न होना है। बोलियों और भाषाओं के विकास को एक गतिशील सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया मानते हुए सरकार ने स्पष्ट किया कि इनके लिए मानक तय करना कठिन है।
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गौरतलब है कि पूर्व में गठित पाहवा (1996) और सीताकांत मोहपात्रा (2003) जैसी समितियाँ भी भाषाओं को शामिल करने के लिए ठोस मानदंड विकसित करने में सफल नहीं रही थीं। सरकार ने सदन को भरोसा दिलाया कि वह क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति जनता की भावनाओं और आवश्यकताओं से पूरी तरह अवगत है, लेकिन मानदंडों के अभाव के कारण सौरा भाषा या किसी अन्य मांग पर विचार करने के लिए फिलहाल कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की जा सकती है।



