भारत के जल संसाधनों की वर्तमान स्थिति पर नज़र डालें तो केंद्रीय जल आयोग के 2024 के अध्ययन के अनुसार देश के नदी बेसिनों में औसत वार्षिक जल उपलब्धता लगभग 2116 अरब घन मीटर आंकी गई है। यदि भूजल की बात करें, तो वर्ष 2025 के आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल 448.52 अरब घन मीटर भूजल का पुनर्भरण होता है, जिसमें से लगभग 247.22 अरब घन मीटर जल का निष्कर्षण किया जा रहा है। जल प्रबंधन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्यों की होती है, लेकिन केंद्र सरकार तकनीकी और वित्तीय सहायता के माध्यम से इन प्रयासों को मजबूती देती है। इसी कड़ी में अंतर्राज्यीय नदी जल विवादों को सुलझाने के लिए अब तक 9 न्यायाधिकरण गठित किए जा चुके हैं, जिनमें से 5 अपनी रिपोर्ट सौंप चुके हैं।
विशेष रूप से राजस्थान जैसे शुष्क राज्य के लिए केंद्र ने कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें ‘नदियों को आपस में जोड़ने’ (ILR) का कार्यक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके तहत यमुना-राजस्थान, राजस्थान-साबरमती और संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल लिंक जैसी परियोजनाओं पर काम चल रहा है। हाल ही में दिसंबर 2024 में हुए एक समझौते के बाद राजस्थान को पार्वती-कालीसिंध-चंबल परियोजना से पेयजल और सिंचाई के लिए भारी मात्रा में जल प्राप्त होगा। साथ ही, पीएम कृषि सिंचाई योजना के जरिए गंग नहर और नर्मदा नहर जैसी परियोजनाओं का आधुनिकीकरण भी पूरा किया गया है, जिससे जालोर, बाड़मेर और श्रीगंगानगर जैसे जिलों को सीधा लाभ मिल रहा है।
नक्सलवाद के खिलाफ छत्तीसगढ़ में निर्णायक जंग: बस्तर में सिमटता ‘लाल गलियारा’
जल संरक्षण के क्षेत्र में ‘जल शक्ति अभियान: कैच द रेन’ और ‘जल संचय जन भागीदारी’ जैसी पहल एक जन आंदोलन का रूप ले चुकी हैं। राजस्थान में इन अभियानों के तहत फरवरी 2026 तक 1 लाख से अधिक जल संचयन संरचनाओं का निर्माण और 4 लाख से अधिक सामुदायिक कार्यों को पूरा किया गया है। इसके अलावा, प्रदूषण नियंत्रण के लिए जोधपुर की जोजारी नदी में सीवेज उपचार संयंत्र स्थापित करने जैसी परियोजनाओं पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कुल मिलाकर, सरकार का लक्ष्य समाज के साथ मिलकर पानी की हर बूंद का संचयन सुनिश्चित करना है ताकि भविष्य के जल संकट से निपटा जा सके।



