रायपुर:
छत्तीसगढ़ में मानसून अब पूरी तरह से एक्टिव हो चुका है। हालांकि शुरुआती दौर में मानसून के अराइवल (आगमन) में करीब 10 दिनों की देरी हुई थी, लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह में हुई झमाझम बारिश ने पूरी कसर निकाल दी है। इस अच्छी बारिश की बदौलत अब खेतों में पर्याप्त नमी और पानी उपलब्ध हो गया है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) के कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्तमान मौसम खरीफ फसलों, विशेषकर धान की बुआई और रोपाई के लिए एकदम परफेक्ट है। इसलिए किसानों को सलाह दी गई है कि वे इस वेदर का पूरा फायदा उठाते हुए अपने कृषि कार्य समय पर निपटा लें, ताकि आगे चलकर धान के प्रोडक्शन (उत्पादन) पर किसी भी तरह का कोई बुरा असर न पड़े।
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस साल ‘अल नीनो’ के प्रभाव के कारण मानसून सामान्य समय से देर से पहुंचा, जिसके चलते जून महीने में एवरेज से लगभग 40 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई थी। लेकिन अब रायगढ़ जिले सहित छत्तीसगढ़ के अधिकांश मैदानी क्षेत्रों के खेतों में पर्याप्त पानी जमा हो गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जिन किसानों की नर्सरी तैयार है, वे तुरंत खेतों में मचाई कर धान की रोपाई का काम शुरू कर दें। वहीं, जिन किसानों के पास नर्सरी रेडी नहीं है, वे ‘लेही पद्धति’ का इस्तेमाल करके अंकुरित बीजों की बुआई ड्रम सीडर या छिटकवा विधि से कर सकते हैं। रायगढ़ जिले के लिए विशेष गाइडलाइन जारी करते हुए वैज्ञानिकों ने कहा है कि धान की सीधी बुआई (Direct Seeding) करने वाले किसान हर हाल में 15 जुलाई तक अपना काम निपटा लें। इसके अलावा, जो किसान रोपाई या बियासी पद्धति अपनाते हैं, वे 30 जुलाई तक अपना काम पूरा कर लें। देरी से बचने के लिए किसानों को कम समय (125-130 दिन) में पकने वाली धान की वैरायटियों जैसे इन्द्रावती, छत्तीसगढ़ बारानी, इंदिरा एरोबिक, एमटीयू-1010, एमटीयू-1153, एमटीयू-1156, एमटीयू-1001, विक्रम टीसीआर, छत्तीसगढ़ धान-1919, छत्तीसगढ़ तेजस्वी और महामाया का चयन करने को कहा गया है।
अच्छे उत्पादन के लिए वैज्ञानिकों ने ‘सीड ट्रीटमेंट’ (बीज उपचार) को सबसे जरूरी बताया है। धान की बुआई से पहले बीजों को कार्बेन्डाजिम या किसी अच्छे फंगिसाइड से ट्रीट करना आवश्यक है, जिसके लिए प्रति किलोग्राम बीज में ढाई ग्राम दवा का उपयोग करना चाहिए। इसके साथ ही एजोस्पाइरिलम, पीएसबी और केएसबी जैसे बायो-फर्टिलाइजर्स (जैव उर्वरकों) से बीज उपचार करने पर फसल को पर्याप्त नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश मिलता है, जिससे केमिकल फर्टिलाइजर्स पर निर्भरता कम होती है। जिन इलाकों में लगातार बारिश से वाटर-लॉगिंग (खेतों में पानी भरा होना) की स्थिति है, वहां ‘लेही पद्धति’ सबसे बेस्ट है। इसके तहत धान के बीजों को 8 से 10 घंटे पानी में भिगोकर 24 से 30 घंटे तक अंकुरित किया जाता है और फिर मचाई किए गए खेतों में ड्रम सीडर से बुआई की जाती है, जिसमें प्रति एकड़ लगभग 40 किलो बीज परफेक्ट माना गया है।
आखिर में, वैज्ञानिकों ने खरपतवार (Weeds) और फर्टिलाइजर मैनेजमेंट पर भी बड़ा अलर्ट जारी किया है। सीधी बुआई वाले खेतों में खरपतवार सबसे बड़ी मुसीबत बन सकते हैं, जिससे प्रोडक्शन में 50 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। इसलिए बुआई के शुरुआती 40 दिनों तक खेत को साफ रखना जरूरी है, जिसके लिए 20 और 40 दिन बाद हाथ से निंदाई या पैडी वीडर का इस्तेमाल किया जा सकता है। खाद के सही गणित को समझाते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि प्रति एकड़ मैक्सिमम दो बोरी यूरिया, एक बोरी डीएपी और आधी बोरी पोटाश का ही यूज करें। इसमें डीएपी और पोटाश की पूरी मात्रा बुआई या रोपाई के वक्त ही डाल दें, जबकि यूरिया की पहली डोज 30-35 दिन बाद और दूसरी डोज 60-70 दिन बाद दें। साथ ही, मिट्टी की ताकत बढ़ाने के लिए हरी खाद और नील-हरित काई का भी उपयोग करें। कृषि विभाग ने रायगढ़ के किसानों से अपील की है कि किसी भी प्रकार की समस्या होने पर वे तुरंत नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि अनुसंधान केंद्र या कृषि विभाग के अफसरों से संपर्क कर एक्सपर्ट एडवाइस लें।

