UIDAI की बड़ी उपलब्धि: 5 महीने में 1 करोड़ स्कूली बच्चों का बायोमेट्रिक अपडेट पूरा
नई दिल्ली: उत्तर भारत के आम बागवानों के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर है। दशहरी, लंगड़ा और चौसा जैसी आम की प्रसिद्ध किस्मों में ‘द्विवार्षिक फलने’ (एक साल छोड़कर फल आना) की जो बड़ी समस्या थी, उसका समाधान अब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों ने ढूंढ लिया है। 10 फरवरी 2026 को लोकसभा में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री रामनाथ ठाकुर द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत में यह समस्या अधिक देखी जाती है, लेकिन अब आधुनिक तकनीकों और नई किस्मों से इसे दूर किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ में रचा गया इतिहास: एक साथ 6,412 जोड़ों का विवाह, बना ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’
दशहरी और लंगड़ा जैसी किस्मों में क्यों आती है यह समस्या? वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि आम के पेड़ों में हर दूसरे साल फल आना एक वंशानुगत शारीरिक लक्षण है। इसके पीछे नाइट्रोजन और कार्बन का भंडारण, हार्मोनल असंतुलन, जलवायु परिवर्तन और पुराने तरीके की कृषि पद्धतियां मुख्य कारण रही हैं। विशेष रूप से दशहरी, लंगड़ा, चौसा और अल्फोंसो जैसी किस्मों में यह समस्या अधिक पाई गई है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता था।
ICAR का समाधान: ‘आम्रपाली’ और ‘मल्लिका’ जैसी नियमित किस्में इस चुनौती से निपटने के लिए ICAR के संस्थानों (IARI दिल्ली, IIHR बेंगलुरु और CISH लखनऊ) ने आम की ऐसी किस्में और संकर (Hybrids) विकसित किए हैं जो हर साल फल देते हैं। इनमें आम्रपाली, मल्लिका, पूसा अरुणिमा, अर्का सुप्रभात और सीआईएसएच-अंबिका जैसी कई उन्नत किस्में शामिल हैं। इन किस्मों की गुणवत्तापूर्ण पौध अब पंजीकृत नर्सरियों के माध्यम से किसानों तक पहुँचाई जा रही है, ताकि बागवानी को घाटे के सौदे से बाहर निकाला जा सके।

