नई दिल्ली (PIB): केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने आज देश की स्कूली शिक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए ‘प्रदर्शन ग्रेडिंग सूचकांक 2.0’ (PGI-S) और जिलों के लिए ‘प्रदर्शन ग्रेडिंग सूचकांक’ (PGI-D) 2025-26 की नवीनतम रिपोर्ट जारी कर दी है। भारत की स्कूली शिक्षा दुनिया की सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है, जिसमें 14.67 लाख से अधिक स्कूल, 1.03 करोड़ शिक्षक और लगभग 24.72 करोड़ छात्र शामिल हैं। इस विशाल व्यवस्था में सुधार और प्रतिस्पर्धा लाने के लिए यह इंडेक्स जारी किया गया है।

 यह सूचकांक पूरी तरह से इस बात पर केंद्रित है कि देश के विभिन्न राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपने स्कूलों में शिक्षा का स्तर और प्रशासनिक व्यवस्था कैसे संभाल रहे हैं। इस पूरी रैंकिंग प्रणाली को समझने के लिए इसे चार मुख्य भागों में देखा जा सकता है।

पहले भाग में अंकों और संकेतकों के गणित को रखा गया है। इस पूरी मूल्यांकन व्यवस्था में कुल सत्तर कड़े मापदंड तय किए गए हैं। इन सभी मापदंडों को मिलाकर कुल एक हजार अंकों का एक स्कोरबोर्ड तैयार किया जाता है और हर राज्य को इसी एक हजार अंकों में से नंबर दिए जाते हैं। इसमें राज्यों के बीच किसी भी तरह के मतभेद या कड़वाहट को दूर करने के लिए पारंपरिक रैंक जैसे पहला दूसरा या तीसरा स्थान देने के बजाय ग्रेडिंग प्रणाली का उपयोग किया जाता है जिससे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले कई राज्य एक ही ग्रेड या श्रेणी में शामिल हो सकते हैं।

दूसरे भाग में मूल्यांकन की दो मुख्य श्रेणियां बनाई गई हैं। पहली श्रेणी का नाम परिणाम है जो सीधे तौर पर इस बात की जांच करती है कि सरकार के शिक्षा क्षेत्र में किए गए प्रयासों का बच्चों पर क्या वास्तविक असर पड़ रहा है और क्या बच्चे स्कूल आकर कुछ सीख पा रहे हैं। दूसरी श्रेणी का नाम शासन और प्रबंधन है जो प्रशासनिक मजबूती को देखती है कि शिक्षा विभाग कितना पारदर्शी है और क्या बजट का सही समय पर सही जगह इस्तेमाल हो रहा है।

तीसरे भाग में इन श्रेणियों को आगे छह प्रमुख क्षेत्रों या डोमेन में विभाजित किया गया है। पहला क्षेत्र अधिगम परिणाम और गुणवत्ता है जो बच्चों के सीखने के स्तर और उनकी कक्षा के अनुसार भाषा या गणित के ज्ञान को परखता है। दूसरा क्षेत्र शिक्षा तक पहुंच है जो यह देखता है कि राज्य में कितने बच्चों का स्कूल में दाखिला हुआ और कहीं बच्चे बीच में ही पढ़ाई तो नहीं छोड़ रहे हैं। तीसरा क्षेत्र अवसंरचना एवं सुविधाएं है जिसके तहत स्कूल की इमारत बिजली पीने का साफ पानी लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय खेल का मैदान कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी भौतिक सुविधाओं की जांच की जाती है। चौथा क्षेत्र समानता है जो यह सुनिश्चित करता है कि अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति पिछड़ा वर्ग अल्पसंख्यक और दिव्यांग बच्चों को भी सामान्य बच्चों के बराबर ही शिक्षा के अवसर मिलें। पांचवां क्षेत्र शासन प्रक्रियाएं है जो स्कूल ग्रांट के पैसों के ट्रांसफर और प्रशासनिक डिजिटल हाजिरी जैसी व्यवस्थाओं की पारदर्शिता देखता है। छठा क्षेत्र शिक्षक शिक्षा एवं प्रशिक्षण है जो स्कूलों में जरूरी शिक्षकों की संख्या और उन्हें राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत मिलने वाली आधुनिक ट्रेनिंग को ट्रैक करता है।

चौथे भाग में इस पूरी रैंकिंग को निष्पक्ष रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले डेटा के मुख्य सरकारी स्रोतों को रखा गया है। इसमें स्कूलों और शिक्षकों की संख्या के लिए यूडीआईएसई प्लस पोर्टल से आंकड़े लिए जाते हैं। बच्चों की पढ़ाई के स्तर की जांच के लिए पारख राष्ट्रीय सर्वेक्षण के नतीजों को देखा जाता है। मध्याह्न भोजन की स्थिति जानने के लिए पीएम पोषण पोर्टल का उपयोग होता है। बजट और फंड के सही इस्तेमाल के लाइव आंकड़ों के लिए प्रबंध पोर्टल को माध्यम बनाया जाता है और अंत में समाज तथा वालंटियर्स के सहयोग को मापने के लिए विद्यांजलि पोर्टल के डेटा का मिलान किया जाता है।यह पूरी व्यवस्था हर राज्य को यह समझने में मदद करती है कि वे शिक्षा सुधार की दिशा में कितने सफल रहे हैं।

अधिगम परिणाम और गुणवत्ता नाम का यह डोमेन पूरे इंडेक्स का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय स्तंभ माना जाता है क्योंकि इसका सीधा संबंध बच्चों की वास्तविक शिक्षा से है। सरल शब्दों में कहें तो इसका मुख्य उद्देश्य यह जांचना है कि स्कूलों में जाने के बाद बच्चों की पढ़ाई का असल स्तर क्या है और वे अपनी उम्र तथा कक्षा के हिसाब से सही मायने में ज्ञान हासिल कर पा रहे हैं या नहीं।

इस क्षेत्र के अंतर्गत बेहद बारीकी से यह देखा जाता है कि विभिन्न कक्षाओं के छात्र भाषा और गणित जैसे बुनियादी विषयों में कितने मजबूत हैं। उदाहरण के लिए क्या एक तय कक्षा का छात्र अपनी पाठ्यपुस्तक को ठीक से पढ़ और समझ पा रहा है और क्या वह बुनियादी जोड़ घटाव या गुणा भाग जैसे गणितीय सवालों को हल करने में सक्षम है। यह मूल्यांकन इसलिए जरूरी है ताकि केवल कागजों पर पाठ्यक्रम पूरा होने के बजाय बच्चों के सीखने की वास्तविक क्षमता का पता लगाया जा सके।

इस पूरे आकलन को पूरी तरह से निष्पक्ष और सटीक बनाए रखने के लिए किसी स्थानीय रिपोर्ट के बजाय पारख राष्ट्रीय सर्वेक्षण जैसे बड़े और विश्वसनीय टेस्ट के नतीजों को आधार बनाया जाता है। इस राष्ट्रीय स्तर के सर्वेक्षण से मिलने वाले आंकड़ों से यह साफ हो जाता है कि किस राज्य के बच्चे पढ़ाई में आगे हैं और कहां के बच्चों को अपनी क्लास के स्तर तक आने के लिए शिक्षकों के विशेष सहयोग और अतिरिक्त ध्यान की आवश्यकता है।

शिक्षा तक पहुंच नाम का यह डोमेन इस बात का आकलन करता है कि कोई राज्य अपने क्षेत्र के हर एक बच्चे को स्कूल तक लाने और उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़े रखने में कितना सफल रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि पढ़ाई की सुविधा केवल कागजों पर या चुनिंदा इलाकों तक सीमित न रहे बल्कि राज्य के हर कोने में रहने वाले बच्चे के लिए स्कूल जाना मुमकिन और आसान हो।

इस क्षेत्र के अंतर्गत मुख्य रूप से दो बड़े पहलुओं की जांच की जाती है जिसमें पहला पहलू नामांकन अनुपात है। इसके जरिए यह देखा जाता है कि राज्य में मौजूद कुल बच्चों में से कितने प्रतिशत बच्चों ने वास्तव में स्कूलों में अपना नाम लिखवाया है। यह आंकड़ा यह समझने में मदद करता है कि क्या सभी माता पिता अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं और क्या सरकार हर बच्चे को शुरुआती दाखिला दिलाने में कामयाब रही है।

इसका दूसरा और सबसे चुनौतीपूर्ण पहलू ड्रॉपआउट रेट यानी स्कूल छोड़ने की दर है। इसके तहत यह गहराई से जांचा जाता है कि जिन बच्चों ने स्कूल में दाखिला लिया था वे अपनी आगे की पढ़ाई पूरी कर रहे हैं या फिर किसी वजह से बीच में ही स्कूल छोड़ रहे हैं। यह विश्लेषण इसलिए जरूरी है क्योंकि केवल दाखिला करा देना काफी नहीं है बल्कि बच्चों को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक स्कूल में बनाए रखना और उनकी पढ़ाई पूरी करवाना भी राज्य की एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। यह पूरा डोमेन राज्यों को यह सुधारने का रास्ता दिखाता है कि वे बच्चों की स्कूल में उपस्थिति कैसे बढ़ाएं।

अवसंरचना एवं सुविधाएं नाम का यह डोमेन पूरी तरह से स्कूलों के भौतिक ढांचे और वहां मिलने वाले संसाधनों के मूल्यांकन पर केंद्रित है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि बच्चों को पढ़ाई के लिए एक ऐसा सुरक्षित, साफ-सुथरा और आधुनिक माहौल मिलना चाहिए जो उन्हें हर दिन स्कूल आने के लिए प्रेरित करे और उनके स्वास्थ्य तथा विकास में मददगार साबित हो।

इस क्षेत्र के अंतर्गत बहुत से बुनियादी पहलुओं को परखा जाता है जिसमें सबसे पहली जरूरत स्कूल की मजबूत इमारत और बिजली की उपलब्धता है। इसके साथ ही बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए यह देखा जाता है कि क्या परिसर में पीने का साफ और सुरक्षित पानी मौजूद है और हाथ धोने की उचित व्यवस्था है या नहीं। स्वच्छता और छात्र-छात्राओं की गरिमा को सुनिश्चित करने के लिए यह जांचना बेहद जरूरी माना जाता है कि स्कूलों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग तथा पूरी तरह क्रियाशील शौचालय बने हैं या नहीं। इसके अलावा बच्चों के शारीरिक विकास के लिए खेल का मैदान और पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के लिए एक अच्छी लाइब्रेरी का होना भी इस मूल्यांकन का अहम हिस्सा है।

वर्तमान समय की जरूरतों को देखते हुए इस डोमेन में डिजिटल सुविधाओं जैसे कंप्यूटर लैब और इंटरनेट कनेक्टिविटी को बहुत ज्यादा महत्व दिया जाता है ताकि बच्चे तकनीक से जुड़ सकें। साथ ही समावेशी शिक्षा के तहत यह भी देखा जाता है कि क्या स्कूलों में दिव्यांग बच्चों की सुविधा के लिए रैंप और हैंडरेल जैसी बुनियादी चीजें मौजूद हैं। यह पूरा डोमेन राज्यों को यह समझने में मदद करता है कि उन्हें अपने स्कूलों को बच्चों के लिए अधिक सुलभ और साधन-संपन्न बनाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर के किस हिस्से पर सबसे ज्यादा काम करने की आवश्यकता है।

समानता नाम का यह चौथा डोमेन पूरी तरह से इस बात की जांच करता है कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था में समाज के हर वर्ग को आगे बढ़ने के समान अवसर मिल रहे हैं या नहीं। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी बच्चे की पृष्ठभूमि, जाति, लिंग या शारीरिक क्षमता उसकी पढ़ाई के आड़े न आए। इस क्षेत्र के अंतर्गत बहुत गहराई से यह देखा जाता है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और विशेष आवश्यकता वाले यानी दिव्यांग बच्चों को सामान्य बच्चों के बराबर ही उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और वैसी ही सुविधाएं मिल पा रही हैं या नहीं। इसके साथ ही इसका एक बड़ा और अहम लक्ष्य लड़कों और लड़कियों के बीच शिक्षा के अंतर को पूरी तरह से पाटना है ताकि हर स्तर पर छात्राओं का नामांकन और भागीदारी बढ़ सके। यह डोमेन राज्यों को एक ऐसी समावेशी व्यवस्था बनाने के लिए प्रेरित करता है जहां समाज का सबसे कमजोर या हाशिए पर मौजूद बच्चा भी बिना किसी भेदभाव के गर्व और सम्मान के साथ अपनी पढ़ाई पूरी कर सके।

शासन प्रक्रियाएं नाम का यह पांचवां डोमेन सीधे तौर पर सरकारी सिस्टम की प्रशासनिक मजबूती, कार्यकुशलता और पारदर्शिता के मूल्यांकन पर केंद्रित है। इसका सरल शब्दों में मतलब यह है कि सरकार की तरफ से बनाई गई नीतियां केवल फाइलों तक सीमित न रहें बल्कि वे पूरी ईमानदारी और सही समय पर जमीन पर लागू की जाएं। इस क्षेत्र के अंतर्गत स्कूल शिक्षा विभाग के काम करने के तरीके को बारीकी से परखा जाता है। इसके तहत यह देखा जाता है कि स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों की डिजिटल हाजिरी नियमित रूप से हो रही है या नहीं ताकि व्यवस्था में पारदर्शिता बनी रहे। साथ ही स्कूलों के विकास, रख-रखाव और बच्चों की सुविधाओं के लिए मिलने वाले सरकारी फंड या स्कूल ग्रांट के पैसों का सही समय पर और सही जगह उपयोग हो रहा है या नहीं, इसे भी बहुत गंभीरता से ट्रैक किया जाता है। यह पूरा डोमेन असल में यह जांचने का पैमाना है कि किसी राज्य का प्रशासनिक ढांचा कितना जवाबदेह है और वह शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए तय की गई राष्ट्रीय नीतियों और योजनाओं को कितनी सटीकता से जमीनी स्तर पर उतार पा रहा है।

बिना किसी चिन्ह, बुलेट पॉइंट या विशेष फ़ॉर्मेटिंग के, इन अंतिम दोनों डोमेन का पूरा विवरण नीचे दिया गया है:

शासन प्रक्रियाएं नाम का यह पांचवां डोमेन पूरी तरह से सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली, उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही को मापने पर केंद्रित है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शिक्षा के विकास के लिए बनाई गई तमाम योजनाएं और नीतियां केवल कागजों या दफ्तरों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका पूरा लाभ सीधे स्कूलों और बच्चों तक पहुंचे। इसके अंतर्गत राज्य के शिक्षा विभाग की प्रशासनिक कुशलता को परखा जाता है। इसमें बहुत बारीकी से यह देखा जाता है कि स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों की डिजिटल हाजिरी नियमित रूप से ली जा रही है या नहीं, ताकि पूरी व्यवस्था में ईमानदारी और पारदर्शिता बनी रहे। इसके साथ ही, स्कूलों के रख-रखाव, नई सुविधाओं के निर्माण और रोजमर्रा के खर्चों के लिए मिलने वाले सरकारी फंड या स्कूल ग्रांट के पैसों का सही समय पर और पूरी पारदर्शिता के साथ इस्तेमाल हो रहा है या नहीं, इसे भी बहुत गंभीरता से ट्रैक किया जाता है। यह डोमेन यह जांचने का पैमाना है कि सरकारी सिस्टम कितना सक्रिय है और वह शिक्षा की योजनाओं को जमीनी स्तर पर कितनी सटीकता से लागू कर पा रहा है।

शिक्षक शिक्षा एवं प्रशिक्षण नाम का यह छठा और आखिरी डोमेन स्कूलों में शिक्षकों की सही उपलब्धता और उनकी व्यावसायिक योग्यता के मूल्यांकन पर आधारित है। किसी भी शिक्षा व्यवस्था की सफलता पूरी तरह से उसके शिक्षकों पर निर्भर करती है, इसलिए यह डोमेन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके तहत सबसे पहले यह जांचा जाता है कि राज्य के सभी स्कूलों में छात्रों की संख्या के हिसाब से पर्याप्त मात्रा में शिक्षक मौजूद हैं या नहीं। इसके साथ ही, खाली पड़े शिक्षकों के पदों को भरने के लिए सरकार कितनी तेजी से कदम उठा रही है, इसे भी बहुत प्रमुखता से देखा जाता है। इसके अलावा, बदलते दौर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह भी परखा जाता है कि क्या शिक्षकों को आधुनिक तकनीकों, डिजिटल टूल्स और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के नए नियमों के अनुसार समय-समय पर जरूरी और उच्च स्तरीय ट्रेनिंग दी जा रही है या नहीं। यह पूरा डोमेन राज्यों को यह समझने में मदद करता है कि वे अपने शिक्षकों को कितना सशक्त और कुशल बना रहे हैं, ताकि वे बच्चों को एक बेहतर और आधुनिक भविष्य के लिए तैयार कर सकें।

बिना किसी चिन्ह, बुलेट पॉइंट या विशेष फ़ॉर्मेटिंग के, इस अंतिम भाग का पूरा विवरण नीचे दिया गया है:

डेटा के विश्वसनीय स्रोत और इसके महत्व को समझने के लिए इस अंतिम हिस्से को बहुत ध्यान से देखा जाना चाहिए क्योंकि यही वह बुनियाद है जो पूरी रैंकिंग को निष्पक्ष, पारदर्शी और सटीक बनाती है। केंद्र सरकार इस महत्वपूर्ण इंडेक्स को तैयार करने के लिए किसी एक विभाग की सामान्य रिपोर्ट या कागजी दावों पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं रहती है बल्कि इसके लिए देश के विभिन्न प्रामाणिक और तकनीकी रूप से उन्नत सरकारी पोर्टल्स से लाइव और पूरी तरह से जांचा गया डेटा इकट्ठा किया जाता है।

इन स्रोतों में सबसे पहला और बड़ा नाम यूडीआईएसई प्लस पोर्टल का है जो देश भर के स्कूलों की इमारत, वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर, छात्र छात्राओं के कुल नामांकन और तैनात शिक्षकों की वास्तविक संख्या का बिल्कुल सटीक आंकड़ा प्रदान करता है। इसके बाद बच्चों की पढ़ाई के स्तर और शिक्षा की असली गुणवत्ता को मापने के लिए पारख राष्ट्रीय सर्वेक्षण के नतीजों को शामिल किया जाता है जिससे यह साफ होता है कि बच्चे सिर्फ स्कूल जा ही नहीं रहे हैं बल्कि कुछ सीख भी रहे हैं। स्कूलों में बच्चों के स्वास्थ्य और उनके पोषण को ट्रैक करने के लिए पीएम पोषण पोर्टल से आंकड़े लिए जाते हैं जो मिड डे मील यानी मध्याह्न भोजन योजना की जमीनी स्थिति को बयां करता है। शिक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए मिलने वाले सरकारी बजट, फंड के सही समय पर आवंटन और उसके खर्च की पारदर्शी लाइव मॉनिटरिंग के लिए प्रबंध पोर्टल के डेटा का सहारा लिया जाता है। इसके साथ ही समाज के लोगों, पूर्व छात्रों और वालंटियर्स द्वारा सरकारी स्कूलों को दिए जा रहे आर्थिक या बौद्धिक सहयोग और योगदान को मापने के लिए विद्यांजलि पोर्टल से आंकड़े जुटाए जाते हैं।

यदि बहुत ही आसान और सीधे शब्दों में इस पूरी व्यवस्था का सार निकाला जाए तो परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स राज्यों के लिए एक ऐसे सच्चे आईने की तरह काम करता है जो बिना किसी पक्षपात के हर राज्य को उनकी शिक्षा व्यवस्था की असली तस्वीर दिखा देता है। यह सूचकांक बहुत ही स्पष्टता के साथ राज्यों को यह बताता है कि वे शिक्षा के मामले में देश में कहां खड़े हैं, उनकी ताकत क्या है और प्रशासनिक या बुनियादी स्तर पर उनसे कहां कमियां रह गई हैं। इस इंडेक्स के जरिए राज्यों को यह समझने में सीधी मदद मिलती है कि उन्हें आने वाले समय में अपने फंड और प्रयासों को किन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा लगाने की जरूरत है जैसे कि पिछड़े इलाकों के स्कूलों में इंटरनेट की पहुंच को बढ़ाना हो या फिर बच्चों को बीच में ही पढ़ाई छोड़ने यानी ड्रॉपआउट करने से रोकना हो।

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