रायपुर | 29 मार्च 2026
भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में 31 मार्च की तारीख एक मील का पत्थर साबित होने जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा नक्सलवाद के पूर्ण सफाए के लिए तय की गई समयसीमा के करीब पहुँचते ही आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि कभी देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती रहा माओवाद अब अपने अंतिम सांसें गिन रहा है। पिछले एक दशक में सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और सरकार की प्रभावी पुनर्वास नीतियों के चलते 10,000 से ज्यादा नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने का फैसला किया है। यह बदलाव केवल हथियारों के दम पर नहीं, बल्कि विकास की उन योजनाओं से आया है जिन्होंने दशकों से कटे हुए इलाकों को देश से जोड़ दिया है।
आंकड़ों में तबाही से तरक्की का सफर
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में रिकॉर्ड 2,300 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था, जबकि 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही 630 से अधिक कैडरों ने हथियार डाल दिए हैं। सुरक्षा के मोर्चे पर हुए बड़े बदलावों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2014 में जहाँ केवल 66 मजबूत पुलिस स्टेशन थे, उनकी संख्या अब बढ़कर 586 हो गई है। दुर्गम इलाकों में ऑपरेशन की ताकत बढ़ाने के लिए 68 नाइट-लैंडिंग हेलीपैड और 361 नए सुरक्षा कैंप बनाए गए हैं। इसका सीधा असर यह हुआ कि नक्सली हिंसा से प्रभावित पुलिस स्टेशनों की संख्या 330 से घटकर अब केवल 52 रह गई है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में तो स्थिति यह है कि माओवादी आंदोलन अब बिना किसी बड़े नेतृत्व के पूरी तरह बिखर चुका है।
सड़कों का जाल और संचार की क्रांति
विद्रोह के गढ़ों में बुनियादी ढांचे का विकास नक्सलियों के लिए सबसे बड़ी हार साबित हुआ है। सीमा सड़क संगठन (BRO) ने सुरक्षा बलों के साथ मिलकर उन दुर्गम इलाकों में 15,000 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़कें तैयार की हैं, जहाँ कभी ठेकेदार जाने से भी डरते थे। अकेले पिछले 10 वर्षों में 12,250 किलोमीटर सड़कों का निर्माण पूरा किया गया है। संचार व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए जंगलों के बीच 9,000 मोबाइल टावर लगाए गए हैं, जिससे सूचना तंत्र अब सुरक्षा बलों के पक्ष में है। बस्तर से छत्तीसगढ़ के बीच बिछी रेल लाइन और दंतेवाड़ा से मुनुगुरु तक नई रेल लाइन का सर्वे इस क्षेत्र की आर्थिक तकदीर बदलने की तैयारी है।
शिक्षा और रोजगार से थमी नई भर्ती
नक्सलियों के भर्ती तंत्र को चोट पहुँचाने के लिए सरकार ने शिक्षा और कौशल विकास पर जोर दिया है। प्रभावित क्षेत्रों में 250 एकलव्य स्कूल मंजूर किए गए हैं, जिनमें से 179 सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा 48 जिलों में आईटीआई (ITI) और कौशल विकास केंद्र खोले गए हैं, जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिल रहे हैं। पीएम-आवास योजना के तहत घरों की संख्या भी 92,000 से बढ़कर 2.54 लाख पार कर गई है। आयुष्मान कार्ड और आधार नामांकन ने सरकारी योजनाओं की पहुँच अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित कर दी है।
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फंडिंग पर प्रहार और पुनर्वास नीति
नक्सलवाद की कमर तोड़ने में एनआईए (NIA) और ईडी (ED) की भूमिका भी अहम रही है। करोड़ों रुपये की संपत्ति जब्त कर ‘शहरी नक्सलियों’ और उनके सूचना तंत्र की फंडिंग को पूरी तरह ठप कर दिया गया है। दूसरी ओर, सरकार की नई पुनर्वास नीति उन लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है जो हिंसा छोड़ना चाहते हैं। आत्मसमर्पण करने वालों को न केवल तत्काल आर्थिक मदद दी जा रही है, बल्कि उन्हें घर और प्रोफेशनल ट्रेनिंग भी प्रदान की जा रही है ताकि वे समाज में सम्मानजनक जीवन जी सकें। 31 मार्च की समयसीमा के साथ भारत अब एक नए ‘नक्सल मुक्त’ युग की ओर कदम बढ़ा चुका है।
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