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देश में आम आदमी की रसोई पर महंगाई का दबाव लगातार गहराता जा रहा है। आने वाले दिनों में आम लोगों को खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के जरूरी सामान के लिए और ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ सकती है। इस समय सबसे बड़ा झटका दालों की कीमतों से लग रहा है, जहां चना और अरहर (तुअर) समेत लगभग सभी प्रमुख दालों के दाम आसमान छू रहे हैं। इंडिया पल्सेज एंड ग्रेंस एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार में दालों की आवक कम होने और विदेशों से आयात घटने के कारण यह संकट खड़ा हुआ है।
बीते वित्त वर्ष में कुल दाल आयात 69.3 लाख टन से घटकर 57.76 लाख टन रह गया है, जिसमें चने, मसूर और मटर के आयात में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौसम खराब रहा और उर्वरकों की कमी बनी रही, तो आने वाले महीनों में दालों की कीमतें और बढ़ सकती हैं।
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दालों के बाजार पर नजर डालें तो पिछले एक महीने में ही कीमतों में भारी उछाल आया है। मंडियों में पुरानी अरहर का स्टॉक काफी कम बचा है, और सरकार द्वारा अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर 8450 रुपये प्रति क्विंटल किए जाने से बाजार में तेजी को और हवा मिली है। एक महीने के भीतर सोलापुर में तुअर और बीना में मसूर के दाम 250 रुपये प्रति क्विंटल तक बढ़ गए हैं। वहीं पीली मटर और उड़द की कीमतों में 300 रुपये, जबकि देसी चने के भाव में सबसे ज्यादा 350 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 25 अप्रैल से 25 मई के बीच देसी चने का भाव 5300 रुपये से बढ़कर 5650 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच गया है।
इस महंगाई के पीछे अल-नीनो का बढ़ता असर और कमजोर मानसून की चिंता भी एक बड़ी वजह बनी हुई है। मौसम विभाग की आशंकाओं के कारण बाजार में अभी से तनाव है। अगर इस बार सामान्य से कम बारिश होती है, तो खरीफ सीजन में अरहर जैसी फसलों की बुवाई पर सीधा असर पड़ेगा। उत्पादन घटने की इस आशंका से कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून कमजोर रहने का असर सिर्फ दालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सब्जियों और अन्य कृषि उपजों को भी प्रभावित करेगा, जिससे महंगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है।
कृषि उत्पादों के साथ-साथ माल ढुलाई (ट्रांसपोर्ट) के खर्च ने इस आग में घी डालने का काम किया है। डीजल की किल्लत और ईंधन की बढ़ती कीमतों की वजह से ट्रांसपोर्ट सेक्टर भारी दबाव में है। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के अनुसार, कई राज्यों में लगभग 20 फीसदी ट्रक सड़कों से हट चुके हैं, जिसके कारण माल ढुलाई की लागत में 10 से 15 फीसदी तक का इजाफा हो चुका है। ट्रांसपोर्ट महंगा होने का सीधा असर खाने-पीने के सामान और किराना की जरूरी वस्तुओं पर पड़ रहा है।
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महंगाई का यह चक्र यहीं नहीं थमता, बल्कि इसका असर ऑटो सेक्टर पर भी साफ दिखाई दे रहा है। कच्चे माल और ऊर्जा की बढ़ती लागत के कारण टायर और वाहन पुर्जा निर्माता कंपनियों ने कीमतें बढ़ाना शुरू कर दिया है। सिएट के प्रबंध निदेशक अर्णव बनर्जी के मुताबिक, कंपनी मार्च और अप्रैल में टायरों के दाम करीब पांच फीसदी बढ़ा चुकी है और मई-जून में एक और बढ़ोतरी की तैयारी है। वाहनों के पुर्जे और टायर महंगे होने से ट्रांसपोर्ट का खर्च और ज्यादा बढ़ेगा, जिसका अंतिम बोझ घूम-फिरकर आम उपभोक्ताओं की जेब पर ही पड़ेगा।


