रांची: प्रकृति की उपासना, अच्छी फसल की कामना, सामुदायिक एकता और भाई-बहन के अगाध स्नेह का महापर्व ‘करम’ पूरे उत्साह और पारंपरिक विधि-विधान के साथ मनाया जा रहा है। झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति की पहचान माना जाने वाला यह लोकपर्व ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश सहित देश के तमाम आदिवासी बहुल इलाकों में धूमधाम से मनाया जाता है। वहीं, अपनी जड़ों से जुड़े रहने के लिए अब दिल्ली जैसे महानगरों में भी प्रवासी समाज बड़े स्तर पर इसका सामूहिक आयोजन कर रहा है।
अखड़ों में सजी करम डाली, रातभर थिरकेंगे कदम
पर्व को लेकर गांव-देहात से लेकर शहरों तक के अखड़ों की विशेष साफ-सफाई और सजावट की गई है:
परंपरा के अनुसार, अविवाहित युवक पूरी शुद्धता के साथ जंगल से करम वृक्ष की तीन डालियां काटकर लाते हैं। इन डालियों को पूरे सम्मान के साथ अखड़े के मध्य में स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।पूजा समाप्त होने के बाद रातभर मांदर और नगाड़ों की थाप पर पारंपरिक करम गीतों के साथ सामूहिक झूमर नृत्य का दौर चलता है।गांवों में जहां आज भी मांदर की पारंपरिक गूंज और लोकगीतों की मिठास प्रमुख है, वहीं शहरों में आधुनिक वाद्ययंत्रों और डीजे के बीच भी लोगों का सांस्कृतिक उत्साह देखते ही बनता है।
भाइयों की लंबी उम्र और समृद्धि की कामना
धान रोपनी की समाप्ति के बाद मनाया जाने वाला यह पर्व कृषि और पारिवारिक रिश्तों का अद्भुत संगम है:महिलाएं और युवतियां दिनभर उपवास रखकर करम राजा की पूजा करती हैं और अपने भाइयों की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की मंगलकामना करती हैं।करम पर्व में नई फसलों की समृद्धि, पर्यावरण संरक्षण और धरती के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। पूजा में जावा (अंकुरित अनाज), मौसमी फल और फूलों का विशेष अर्पण किया जाता है।
शहरों में भी व्यापक हुआ पर्व का दायरा
करम पर्व अब केवल ग्रामीण चौपालों तक सीमित नहीं रहा है। विभिन्न शहरों में सामाजिक व सांस्कृतिक संगठनों द्वारा भव्य स्तर पर अखड़े तैयार किए जा रहे हैं। आदिवासी समाज के लोग पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर अखड़ों में जुट रहे हैं, जिससे आधुनिकता की दौड़ के बीच भी यह लोकपर्व अपनी सांस्कृतिक गहराई और प्रकृति-प्रेम के संदेश को मजबूती से जीवंत रखे हुए है।


