बेंगलुरु स्थित जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र के शोधकर्ताओं ने प्रकृति और तकनीक के मेल से एक अद्भुत ‘न्यूरोमॉर्फिक सेंसर’ विकसित किया है जो इंसानी दिमाग की तरह जानकारी को समझने और याद रखने में सक्षम है। इस अनोखे आविष्कार की प्रेरणा क्रिकेट मेंढकों से मिली है जो नमी और रोशनी के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। वैज्ञानिकों ने नैनोफाइबर की मदद से एक ऐसा छोटा उपकरण तैयार किया है जो न केवल वातावरण में नमी के बदलावों को महसूस करता है बल्कि उन संकेतों को अस्थायी रूप से अपनी मेमोरी में सुरक्षित भी रख सकता है। यह पहली बार है जब दुनिया में किसी न्यूरोमॉर्फिक डिवाइस के लिए नमी को मुख्य आधार बनाया गया है।

पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक्स के मुकाबले यह नया सेंसर ऊर्जा की भारी बचत करता है क्योंकि इसमें महसूस करने, याद रखने और प्रोसेसिंग करने का काम एक ही प्लेटफॉर्म पर होता है। आमतौर पर कंप्यूटर या मोबाइल में इन कामों के लिए अलग-अलग हिस्सों की जरूरत होती है जिससे बिजली की खपत अधिक होती है, लेकिन यह सेंसर बिल्कुल हमारे मस्तिष्क की तरह काम करता है जो बाहरी संकेतों को लेकर तुरंत फैसला लेता है। यह तकनीक आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसी प्रणालियों को और भी स्मार्ट बनाएगी।
मनरेगा में ई-केवायसी और जियो-टैगिंग के जरिए “छत्तीसगढ़ मॉडल” देश में अव्वल
इस सफलता के बाद भविष्य में ऐसे वियरेबल हेल्थ डिवाइस और स्मार्ट सेंसर बनाना आसान होगा जो हमारे शरीर या वातावरण के प्रति अधिक संवेदनशील होंगे। यह आविष्कार न केवल उन्नत स्वास्थ्य देखभाल उपकरणों में मददगार साबित होगा बल्कि अगली पीढ़ी की टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल इलेक्ट्रॉनिक तकनीक की दिशा में भारत का एक बड़ा कदम है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के स्मार्ट सेंसर से न केवल डेटा प्रोसेसिंग तेज होगी बल्कि बैटरी पर निर्भरता भी काफी कम हो जाएगी।

