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रायपुर।
स्वामी विवेकानंद का जीवन किसी एक स्थान या काल में सीमित नहीं था। वह एक सतत यात्रा थी आत्मबोध की समाज जागरण की और भारत के आत्मसम्मान को पुनर्जीवित करने की। इसी महान जीवन यात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव रायपुर था जो आज छत्तीसगढ़ की राजधानी है। यह वह समय था जब भावी विश्वविख्यात संत अभी नरेंद्रनाथ दत्त थे और उनके भीतर विचारों का संघर्ष आकार ले रहा था।

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रायपुर में बिताए गए वर्ष उनके जीवन के सबसे संवेदनशील और निर्णायक वर्षों में गिने जाते हैं। किशोरावस्था की दहलीज पर खड़े नरेंद्रनाथ ने यहीं समाज को करीब से देखा जीवन की कठिनाइयों को महसूस किया और मनुष्य की पीड़ा को समझा। छत्तीसगढ़ की सरल संस्कृति श्रम और आत्मसम्मान से जुड़ा ग्रामीण जीवन उनके मन में गहरे उतर गया। बाद में उनके विचारों में जो करुणा और मानव सेवा का विस्तार दिखाई देता है उसकी जड़ें इसी अनुभव में दिखाई देती हैं।

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रायपुर प्रवास केवल निवास नहीं था बल्कि चेतना का निर्माण था। यहां की भूमि ने उन्हें यह सिखाया कि भारत की आत्मा शहरों के वैभव में नहीं बल्कि गांवों की सादगी और लोगों के श्रम में बसती है। यही कारण था कि आगे चलकर उन्होंने कहा कि जब तक भारत का अंतिम व्यक्ति सशक्त नहीं होगा तब तक राष्ट्र सशक्त नहीं हो सकता।

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ। बाल्यकाल से ही वे असाधारण मेधा के धनी थे। प्रश्न करना तर्क करना और सत्य को परखना उनका स्वभाव था। संगीत शारीरिक अभ्यास और अध्ययन उनके जीवन के अभिन्न अंग थे। रामकृष्ण परमहंस से भेंट उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला क्षण था। गुरु के सान्निध्य में उन्होंने वेदांत को केवल दर्शन नहीं बल्कि जीवन पद्धति के रूप में अपनाया।

उनका दर्शन किसी संकीर्ण धार्मिक सीमा में बंधा नहीं था। वेदांत उनके लिए मानव एकता का विज्ञान था। वे कहते थे कि हर आत्मा में ईश्वर का वास है और उसी दिव्यता को पहचानना जीवन का उद्देश्य है। उनके लिए पूजा का सर्वोच्च रूप पीड़ित मानव की सेवा था। वे समाज को जड़ बनाने वाले अंधविश्वासों और भेदभाव के कट्टर विरोधी थे और आत्मविश्वास से भरे नए भारत के स्वप्नद्रष्टा थे।

स्वामी विवेकानंद के कार्य उनके विचारों की सजीव अभिव्यक्ति थे। रामकृष्ण मिशन की स्थापना केवल एक धार्मिक संस्था नहीं बल्कि सेवा का आंदोलन थी। शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में दिया गया उनका भाषण भारत के आत्मगौरव का उद्घोष बन गया। उस मंच से उन्होंने पश्चिम को भारत की आध्यात्मिक शक्ति से परिचित कराया और भारतीयों को स्वयं पर विश्वास करना सिखाया।

युवाओं के प्रति उनका विश्वास अडिग था। वे मानते थे कि युवा ही राष्ट्र का भविष्य नहीं बल्कि वर्तमान हैं। उनका संदेश स्पष्ट था मजबूत शरीर निर्भीक मन और उच्च चरित्र ही राष्ट्र निर्माण की नींव है। वे युवाओं से कहते थे कि लक्ष्य स्पष्ट रखो कठिनाइयों से मत डरो और परिश्रम को अपना धर्म बनाओ।

आज जब छत्तीसगढ़ अपने विकास की नई यात्रा पर है तब रायपुर की धरती पर स्वामी विवेकानंद के पदचिह्न युवाओं को प्रेरणा देते हैं। उनका जीवन यह सिखाता है कि महान विचार किसी महल में नहीं बल्कि साधारण जीवन के अनुभवों से जन्म लेते हैं।

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स्वामी विवेकानंद केवल एक संत नहीं थे,वे चेतना थे,वे ऊर्जा थे और वे उस भारत की आवाज थे जो आत्मविश्वास के साथ विश्व से संवाद करता है

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