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नई दिल्ली: सूचना एवं तकनीक के इस दौर में जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक लोकतांत्रिक अधिकार है, वहीं डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलती फर्जी, झूठी और भ्रामक जानकारियों ने नई चुनौतियां पेश कर दी हैं। भारत सरकार इन उभरते जोखिमों को लेकर पूरी तरह सजग है और इसे नियंत्रित करने के लिए बहुआयामी रणनीति पर काम कर रही है। राज्यसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन ने सरकार के इन प्रयासों की विस्तृत जानकारी साझा की।
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सरकार ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत नागरिकों को विचार प्रकट करने की आजादी तो है, लेकिन इसका अर्थ भ्रामक सूचनाएं फैलाना नहीं है। इसी उद्देश्य से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत ‘डिजिटल मीडिया आचार संहिता’ (नियम 2021) को अधिसूचित किया गया है। इसके तहत ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और ऑनलाइन प्रकाशकों के लिए कड़े नियम तय किए गए हैं। अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को न केवल कानून द्वारा प्रतिबंधित सामग्री से बचना होगा, बल्कि अपनी सामग्री को आयु के आधार पर पांच श्रेणियों में वर्गीकृत करना भी अनिवार्य होगा। विशेषकर बच्चों को अनुपयुक्त सामग्री से बचाने के लिए इन प्लेटफॉर्म्स को अब सुरक्षा के पुख्ता उपाय करने होंगे।
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सिर्फ ओटीटी ही नहीं, बल्कि समाचार और समसामयिक विषयों से जुड़े डिजिटल प्रकाशकों को भी अब ‘प्रेस परिषद अधिनियम’ और ‘केबल टेलीविजन नेटवर्क अधिनियम’ की आचार संहिता का कड़ाई से पालन करना होगा। नियमों के मुताबिक, कोई भी प्रकाशक अधूरी सच्चाई, जानबूझकर फैलाया गया झूठ या भ्रामक संकेत प्रसारित नहीं कर सकता। यही नियम निजी सैटेलाइट टीवी चैनलों पर भी लागू होते हैं, जहां कार्यक्रम और विज्ञापन दोनों को निर्धारित संहिताओं के दायरे में रहना होगा।
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सरकारी सूचनाओं की सत्यता परखने के लिए सरकार ने तंत्र को और मजबूत किया है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत संचालित ‘प्रेस सूचना ब्यूरो’ (PIB) की फैक्ट चेक यूनिट (FCU), जो नवंबर 2019 से कार्यरत है, लगातार फर्जी खबरों की पहचान कर रही है। यह यूनिट संबंधित मंत्रालयों से पुष्टि के बाद सोशल मीडिया के माध्यम से जनता तक सही जानकारी पहुंचाती है। सरकार के इन कदमों से यह साफ है कि आने वाले समय में डिजिटल मीडिया और टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाली सामग्री की गुणवत्ता और सत्यता के प्रति जवाबदेही और अधिक बढ़ेगी।
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