रायपुर: छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में गिरते भू-जल स्तर को सुधारने और मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए राज्य सरकार बड़े पैमाने पर “भू-जल संरक्षण विकास कार्य” संचालित कर रही है। विधानसभा में विधायक श्री योगेश्वर राजू सिन्हा द्वारा पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए वन मंत्री श्री केदार कश्यप ने इस योजना की रूपरेखा और इसके दूरगामी परिणामों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
मंत्री ने जानकारी दी कि प्रदेश के वनमंडलों में वैज्ञानिक पद्धति से जल संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। इसमें मुख्य रूप से मिट्टी और पत्थर की समोच्च मेढ़, एकांतर समोच्च खेती, जल अवशोषण तालाब, परकोलेशन तालाब और चेकडेम जैसी संरचनाओं का निर्माण शामिल है। इन कार्यों के लिए जी.आई.एस. (GIS) तकनीक का प्रभावी उपयोग किया जा रहा है, जिससे ‘शिखर से घाटी’ के सिद्धांत पर जलसंग्रहण क्षेत्रों का चयन कर सटीक निर्माण कार्य सुनिश्चित किया जाता है।
इस योजना का मुख्य उद्देश्य वनों के संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना है। सरकार का लक्ष्य है कि इन प्रयासों से न केवल मिट्टी के कटाव में कमी आए, बल्कि भू-जल स्तर में सुधार होने से वनों की पुनरुत्पादन क्षमता में भी बढ़ोतरी हो। इससे वन्यप्राणियों के लिए साल भर वनों में ही पर्याप्त पेयजल उपलब्ध रहेगा, जिससे उन्हें पानी की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा।
योजना के क्रियान्वयन और पारदर्शिता को लेकर मंत्री ने स्पष्ट किया कि इसमें स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ‘ग्रामीण सहभागी समीक्षा’ (PRA) का सहारा लिया जाता है। इसके साथ ही, आधारभूत सर्वेक्षण और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कर हर कार्य की निगरानी की जाती है। इन कार्यों के लिए वित्तीय व्यवस्था वन विभाग के विभागीय बजट और ‘कैम्पा’ (CAMPA) मद से की जा रही है, ताकि वनों का सतत विकास सुनिश्चित हो सके।
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