जशपुर का ‘अजेय सूर्य’, जन-जन का लाडला—
युद्धवीर सिंह जूदेव की जयंती पर विशेष नमन
विशेष लेख: |
समीर इरफ़ान (CG NOW)
छत्तीसगढ़ की राजनीति के इतिहास में कुछ नाम अक्षरों से नहीं, बल्कि जनसेवा के रक्त से लिखे जाते हैं। इन्ही नामों में सबसे ऊपर चमकता है. युद्धवीर सिंह जूदेव। आज 1 मार्च को उनकी जन्म जयंती के अवसर पर जशपुर की वादियाँ अपने उस ‘राजपुत्र’ को याद कर रही हैं, जिसने महलों की सुख-सुविधाओं से ज्यादा गरीब की झोपड़ी और आदिवासी भाइयों के हक को अहमियत दी।
26 जिलों में डायलिसिस सेवाओं का विस्तार, जशपुर और गरियाबंद में एक से अधिक केंद्र
आलोचना से डर कैसा? मानसिक ‘डिफेंस मोड’ को छोड़ें और अपनाएं सफलता का नया नजरिया
1 मार्च 1982 को जशपुर के गौरवशाली राजपरिवार में जन्मे युद्धवीर सिंह जूदेव को ‘वीरता’ विरासत में मिली थी। ‘हिंदू हृदय सम्राट’ स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव के साये में पले-बढ़े युद्धवीर ने बचपन से ही निर्भीकता का पाठ पढ़ा था। उनके व्यक्तित्व में एक अनोखा आकर्षण था. आँखों में तेज, वाणी में सिंह जैसी गर्जना और स्वभाव में समर्पण।
शिक्षा के क्षेत्र में ‘AI’ क्रांति: यूडीआईएसई+ अब बनेगा आधुनिक ‘डिसीजन सपोर्ट सिस्टम’
सियासत का ‘नौजवान शेर’:जशपुर से चंद्रपुर तक धाक
युद्धवीर सिंह ने यह साबित कर दिया कि असली नेता वही है जो जनता के दिलों पर राज करे। महज 26 साल की उम्र में उन्होंने छत्तीसगढ़ की विधानसभा में कदम रखकर अपनी धमक दिखाई।2008 और 2013 में चंद्रपुर विधानसभा से उनकी जीत महज एक चुनाव नहीं, बल्कि जनता का उन पर अटूट विश्वास था।
‘ग्रीन गोल्ड’ का कारोबार! ओडिशा से उत्तर भारत तक फैला 800 करोड़ का ‘गांजा कॉरिडोर’
कोरवा आदिवासियों के उत्थान के लिए उन्होंने जो जमीनी लड़ाई लड़ी, उसने उन्हें ‘जननायक’ बना दिया। शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं को सुदूर अंचलों तक पहुँचाना उनका एकमात्र लक्ष्य था।
”होली पर खगोलीय संयोग: 3 मार्च को दिखेगा साल का पहला चंद्र ग्रहण
प्रकृति का महापर्व सरहुल: जब मांदर की थाप पर झूम उठती है धरती और महक उठता है सखुआ-साल
पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए, उन्होंने अपनी संस्कृति और जड़ों की रक्षा को ही अपना परम धर्म माना। ‘घर वापसी’ अभियान के माध्यम से उन्होंने हजारों लोगों को आत्म-सम्मान के साथ मुख्यधारा में वापस लाया। वे एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने आधुनिक राजनीति करते हुए भी अपनी सनातन परंपराओं का दामन कभी नहीं छोड़ा।
यादें जो कभी धुंधली नहीं होंगी
20 सितंबर 2021 को भले ही नियति ने उन्हें हमसे भौतिक रूप से दूर कर दिया, लेकिन जशपुर के कण-कण में उनकी स्मृतियाँ आज भी जीवित हैं। अपनी धर्मपत्नी संयोगिता सिंह जूदेव और भरे-पूरे परिवार को छोड़कर वे भले ही ‘अमर लोक’ सिधार गए, पर उनके आदर्श आज भी युवाओं के लिए मशाल का काम कर रहे हैं।
“मिट्टी की सौगंध खाकर जो रण में उतरा था,
वो जशपुर का ‘वीर’ हर दिल में उतरा था।
रुखसत हुआ जहाँ से तो क्या हुआ ‘समीर’,
इतिहास के पन्नों पर वो शेर की तरह उभरा था!”
1 मार्च 2026 से बदल जाएंगे रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े कई नियम
युद्धवीर सिंह जूदेव आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी दहाड़ आज भी अन्याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ में सुनाई देती है। जशपुर के इस ‘युद्धवीर’ को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन।
प्रधानमंत्री योग पुरस्कार 2026 के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू……..

