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जशपुर। छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल जिले जशपुर में इस वर्ष भी होली का उल्लास अपनी प्राचीन जड़ों की ओर लौटता दिखाई दे रहा है। जहाँ आधुनिकता के दौर में रासायनिक रंगों ने त्योहार की शुद्धता को प्रभावित किया है, वहीं जशपुर के सन्ना, बगीचा, मनोरा और दुलदुला जैसे ग्रामीण अंचलों में आज भी पलाश और धवई के फूलों से बनी ‘प्राकृतिक होली’ की गूँज है। यहाँ की होली केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, कड़े सामाजिक अनुशासन और ग्रामीण अर्थशास्त्र का एक अद्भुत मेल है।

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फूलों से खिलता अर्थशास्त्र और सेहत का संगम
जशपुर के जंगलों में इन दिनों पलाश और धवई के फूलों की बहार है। ग्रामीण, विशेषकर महिलाएं और बच्चे, सूरज ढलने से पहले ही इन फूलों को इकट्ठा कर लेते हैं। इन फूलों को पानी में उबालकर केसरिया और लाल रंग तैयार किया जाता है, जो पूरी तरह रसायनों से मुक्त और त्वचा के लिए औषधीय गुणों से भरपूर होता है। वनस्पति शास्त्रियों के अनुसार, धवई के फूलों में किडनी और त्वचा रोगों को ठीक करने की क्षमता होती है। दिलचस्प बात यह है कि यह परंपरा अब ग्रामीणों के लिए रोजगार का जरिया भी बन गई है। शासन द्वारा धवई फूल का समर्थन मूल्य 32 रुपये प्रति किलो तय होने से वनवासियों को आर्थिक मजबूती मिली है। अकेले जशपुर जिले से हर साल लगभग 50 लाख रुपये के फूल लखनऊ जैसे बड़े शहरों में प्राकृतिक गुलाल बनाने के लिए भेजे जाते हैं।

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परंपराओं का कड़ा पहरा: सगाई और नवविवाहितों के लिए खास नियम
आदिवासी समाज में होली को लेकर कुछ बेहद दिलचस्प और कड़े सामाजिक नियम आज भी जीवित हैं। जिले के ऊपरी पाठ क्षेत्रों में मान्यता है कि जिन युवक-युवतियों की शादी तय (सगाई) हो चुकी है, उन्हें होलिका दहन के सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होने की अनुमति नहीं होती। इसके पीछे पूर्वजों का तर्क है कि यह नियम उन्हें किसी भी संभावित शारीरिक क्षति या अनहोनी से बचाने के लिए बनाया गया है। इसी तरह, गर्भवती महिलाओं और उनके पतियों के लिए भी अनुशासन कड़ा है; वे केवल दूर से होलिका की लौ देख सकते हैं, जलती हुई लकड़ी देखना उनके लिए वर्जित है। रिश्तों की मर्यादा का आलम यह है कि शादी के बाद पहली होली पर दुल्हन का अपने मायके में होना और दूल्हे का अपने ससुराल जाना अनिवार्य माना जाता है।

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मांदर की थाप और फाग गीतों की गूँज
होली का उत्सव यहाँ एक महीने पहले ‘छद्म शिकार’ और मांदर की थाप के साथ शुरू हो जाता है। होलिका दहन की रात गांव के सार्वजनिक स्थान पर अंडे, सिक्के और अंगूठी गाड़कर विशेष पूजा की जाती है। गांव का मुखिया जब अग्नि प्रज्वलित करता है, तब पूरा गांव ढोलक और झांझ की थाप पर पारंपरिक फाग गीतों में डूब जाता है। पुरुष बांस के सुंदर मुखौटे पहनकर नृत्य करते हैं, जो उनके पूर्वजों की वीरता और शिकार संस्कृति की याद दिलाते हैं। अगले दिन, पूरा गांव ऊंच-नीच का भेद भूलकर पलाश के रंगों में सराबोर हो जाता है और सामुदायिक भोज के साथ आपसी सद्भाव का संदेश देता है।

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जशपुर की यह पारंपरिक होली हमें सिखाती है कि कैसे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर और अपनी जड़ों से जुड़कर त्योहारों की असली मिठास को बचाए रखा जा सकता है। रासायनिक रंगों के इस दौर में जशपुर के आदिवासियों ने अपनी प्राचीन धरोहर को न केवल जीवित रखा है, बल्कि उसे आने वाली पीढ़ी के लिए एक मिसाल के रूप में पेश किया है।

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