ड़ा खुलासा: सरकारी नौकरी की आस में बैठे 15 लाख युवा! रोजगार कार्यालयों के जरिए 2 साल में एक भी ‘सरकारी’ नौकरी नहीं मिली।   केवल निजी संस्थानों ने दिए 15 हजार अवसर। पढ़िए छत्तीसगढ़ के युवाओं के रोजगार पर यह विशेष रिपोर्ट

रायपुर/CG Now:

छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में दी जाने वाली दवाओं की शुद्धता और गुणवत्ता को लेकर विधानसभा में आज महत्वपूर्ण आंकड़े पेश किए गए। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री श्याम बिहारी जायसवाल ने सदन को बताया कि पिछले पांच वर्षों (2021 से फरवरी 2026 तक) के दौरान खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग द्वारा राज्य के विभिन्न चिकित्सा संस्थानों से दवाओं की जांच के लिए कुल 153 नमूने संकलित किए गए। इन जांचों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि मरीजों को दी जा रही दवाएं तय मानकों के अनुरूप हैं या नहीं।

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जांच की सुस्त रफ्तार और अमानक दवाओं का सच:

मंत्री द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, लिए गए 153 नमूनों में से अब तक 127 नमूनों की जांच रिपोर्ट सामने आई है जो मानकों के अनुरूप पाई गई हैं। हालांकि, चिंता का विषय यह है कि 03 औषधियों के नमूने ‘अमानक’ (Not of Standard Quality) घोषित किए गए हैं। इन अमानक दवाओं की आपूर्ति करने वाली कंपनियों, सप्लायर फर्मों और किन अस्पतालों में इनका वितरण किया गया, इसका विस्तृत ब्यौरा विधानसभा पुस्तकालय में रखे प्रपत्रों में दर्ज किया गया है। शासन ने आश्वस्त किया है कि अमानक दवाएं पाए जाने पर संबंधित फर्मों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है।

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इकलौती लैब और भारी वर्कलोड:

दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी के लिए प्रदेश की बुनियादी संरचना पर भी सवाल उठ रहे हैं। मंत्री ने स्वीकार किया कि वर्तमान में पूरे राज्य में दवाओं की गुणवत्ता जांच के लिए केवल 01 औषधि परीक्षण प्रयोगशाला (कालीबाड़ी, रायपुर) कार्यरत है। इस प्रयोगशाला की क्षमता प्रति माह 90 से 100 औषधि नमूनों की जांच करने की है। पूरे प्रदेश की दवाओं का भार केवल एक लैब पर होने के कारण जांच की गति और व्यापकता पर असर पड़ना स्वाभाविक है।

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मरीजों की सुरक्षा पर राहत भरी खबर:

अमानक दवाओं के उपयोग से जुड़े जोखिमों पर स्पष्टीकरण देते हुए स्वास्थ्य मंत्री ने सदन को बताया कि अब तक राज्य में ऐसी किसी भी घटना की जानकारी सामने नहीं आई है जहाँ अमानक दवाओं के कारण किसी मरीज के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो, उपचार में असफलता मिली हो या किसी की मृत्यु हुई हो। सरकार का दावा है कि गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र सतर्कता से काम कर रहा है ताकि मरीजों के जीवन से कोई खिलवाड़ न हो सके।

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 पिछले पांच सालों में केवल 153 नमूनों का लिया जाना यह दर्शाता है कि सरकारी अस्पतालों में दवाओं की सैंपलिंग की रफ्तार काफी धीमी है। 11 हजार से ज्यादा स्वास्थ्य केंद्रों वाले राज्य में पांच साल में महज डेढ़ सौ नमूनों की जांच ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। इसके अलावा, पूरे प्रदेश के लिए मात्र एक लैब का होना भी दवा सुरक्षा (Drug Safety) के मोर्चे पर एक बड़ी चुनौती है।

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