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मोहब्बत की फिज़ा सिर्फ शहरों में ही नहीं, गाँव की पगडंडियों, खेतों की मेड़ और कच्ची गलियों में भी आज गुलाबों की महक बनकर तैर रही है। सात फरवरी का ‘रोज डे’ अब गाँव के युवाओं के लिए भी एक खास दिन बन चुका है, जहाँ भावनाएँ सादी हैं, लेकिन एहसास बेहद गहरे।
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गाँव का अपना अंदाज़, अपना गुलाब
शहरों की तरह यहाँ महंगे बुके नहीं, बल्कि खेतों की मेड़ पर खिले देसी गुलाब ही सबसे बड़ी दौलत हैं। सुबह की ठंडी धूप में जब युवतियाँ कुएँ और पंप के पास पानी भरने निकलती हैं, तो कई हाथों में एक ताज़ा तोड़ा हुआ लाल गुलाब दिख जाता है—बिना किसी दिखावे, बिना किसी शोर-शराबे के।
गाँव के लड़के आज भी दुकान से नहीं, अपनी ही बाड़ी से गुलाब तोड़कर देते हैं। इस सादगी में जो अपनापन है, वह शहरों की चकाचौंध से कहीं ज्यादा खूबसूरत लगता है।
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रंगों में भी छिपी हैं भावनाएँ
पीले गुलाब खेत में साथ काम करने वाले दोस्तों के बीच दोस्ती का पैगाम बनकर घूमते हैं।गुलाबी फूल अक्सर स्कूल के बैग में दबे मिले जाते हैं—किसी की प्रशंसा, किसी की चुपचाप मोहब्बत का एहसास लेकर। सफेद गुलाब आज गाँव की गलियों में नई शुरुआत और सादगी भरी नीयत का प्रतीक बने हुए हैं।
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महँगाई नहीं रोक पाई गाँव की मोहब्बत
गुलाब शहर की तरह महँगे यहाँ भी हुए हैं, लेकिन गाँव का दिल आज भी कंजूसी नहीं करता।चाय दुकानों पर बैठे बुजुर्ग मुस्कुराकर कहते हैं—“अरे, प्यार का दिन है, गुलाब तो देना ही चाहिए।”दुकानदार बताते हैं कि आज फूलों की बिक्री दोगुनी हो जाती है। कई बच्चे अपनी बचत की छोटी-सी पोटली खोलकर एक-एक गुलाब खरीदते हैं और अपने प्रिय लोगों को देते हैं।
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डिजिटल गाँव में भी गुलाबों की बारिश
अब गाँव भी स्मार्टफोन की रोशनी में चमकता है। आज वॉट्सऐप स्टेटस, फेसबुक स्टोरी और इंस्टाग्राम रील पर गुलाबों की बरसात हो रही है।दूर कमाने गए युवा भी वीडियो कॉल पर अपने घर वालों को रोज डे की शुभकामनाएँ भेज रहे हैं।
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गाँव में भी गुलज़ार हुई मोहब्बत
रोज डे आज गाँव के दिलों में भी वही एहसास जगाता है जो शहरों की बड़ी सड़कों पर दिखता है. जो कि सादगी में लिपटा, मिट्टी की सुगंध में भीगा और दिल की गहराई से निकला हुआ प्यार है।गाँव की वही पुरानी हवा आज गुलाब की महक से भर उठी है, और हर गली, हर चौपाल, हर खेत कह रहा है.
मोहब्बत की खुशबू शहर–गाँव सब पर बराबर बरसती है।
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