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नई दिल्ली:
भारतीय श्रम बाजार से राहत और उत्साह देने वाले आंकड़े सामने आए हैं। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी अक्टूबर-दिसंबर 2025 की तिमाही रिपोर्ट के अनुसार, देश में बेरोजगारी दर में गिरावट दर्ज की गई है, जबकि श्रम बल सहभागिता दर (LFPR) में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। विशेष रूप से महिलाओं के लिए यह समय काफी सकारात्मक रहा है, जहाँ कार्यबल में उनकी सक्रियता तेजी से बढ़ी है।

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कार्यबल में महिलाओं का बढ़ता कदम रिपोर्ट के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक महिला श्रम बल सहभागिता दर में हुई वृद्धि है। 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की भागीदारी जुलाई-सितंबर 2025 के 33.7% से बढ़कर अक्टूबर-दिसंबर 2025 में 34.9% तक पहुँच गई है। इस वृद्धि का मुख्य केंद्र ग्रामीण क्षेत्र रहा है, जहाँ महिलाओं की भागीदारी 37.5% से बढ़कर 39.4% हो गई। यह आंकड़ा ग्रामीण भारत में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की एक मजबूत तस्वीर पेश करता है।

बेरोजगारी दर में गिरावट और रोजगार के नए अवसर देश में बेरोजगारी दर (UR) के मोर्चे पर भी अच्छी खबर मिली है। ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 4.4% से घटकर 4.0% रह गई है, जिसमें पुरुष और महिला दोनों वर्गों में सुधार देखा गया है। वहीं, शहरी क्षेत्रों में भी यह दर 6.9% से घटकर 6.7% पर आ गई है। रोजगार के स्वरूप की बात करें तो ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में स्वरोजगार (Self-employment) की तरफ लोगों का रुझान बढ़ा है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार करने वालों की संख्या बढ़कर 63.2% हो गई है, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है।
कृषि और सेवा क्षेत्र का दबदबा भारतीय कार्यबल की संरचना में ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कृषि क्षेत्र की प्रधानता बनी हुई है। ताज़ा तिमाही में कृषि क्षेत्र में नियोजित व्यक्तियों की संख्या बढ़कर 58.5% हो गई है। दूसरी ओर, शहरी भारत में तृतीयक क्षेत्र (सेवा क्षेत्र) सबसे बड़ा नियोक्ता बना हुआ है, जहाँ 61.9% श्रमिक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। मंत्रालय के अनुमानों के मुताबिक, अक्टूबर-दिसंबर 2025 के दौरान देश में कुल कार्यरत व्यक्तियों की संख्या बढ़कर 57.4 करोड़ हो गई है, जिसमें 17.2 करोड़ महिलाएं शामिल हैं।

संशोधित सर्वेक्षण पद्धति से बढ़ी सटीकता सरकार ने जनवरी 2025 से श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) की पद्धति में बड़ा बदलाव किया है। अब केवल वार्षिक ही नहीं, बल्कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के लिए मासिक और त्रैमासिक अनुमान भी प्रदान किए जा रहे हैं। इस नई प्रणाली से श्रम बाजार की बदलती स्थितियों की सटीक निगरानी संभव हो पा रही है, जिससे नीति निर्माताओं को त्वरित और प्रभावी निर्णय लेने में मदद मिल रही है।
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