जशपुर:उदलक नायडू 

छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला अब अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ एक नई आर्थिक क्रांति का साक्षी बन रहा है। सन्ना और मनोरा की पहाड़ियों पर उगने वाली ‘नाशपाती’ आज जशपुर का ‘ग्रीन गोल्ड‘ बनकर उभरी है। नाशपाती की बंपर पैदावार और इसकी बढ़ती मांग ने यहाँ के किसानों के जीवन में सुनहरे दिन ला दिए हैं। कभी धान की पारंपरिक खेती तक सीमित रहने वाले जशपुर के किसान अब बागवानी के दम पर लखपति बनकर अपनी तकदीर लिख रहे हैं।


सन्ना और मनोरा की भौगोलिक स्थिति नाशपाती के लिए ‘गोल्डन जोन’ साबित हो रही है। यहाँ की जलवायु और मिट्टी का अनूठा तालमेल फलों में वह मिठास और रसीलापन घोल रहा है, जिसकी मांग अब छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों के बड़े बाजारों में भी सिर चढ़कर बोल रही है। वैज्ञानिक प्रबंधन और सही देखरेख का ही नतीजा है कि यहाँ एक-एक पेड़ से 400 से 500 किलोग्राम तक उत्पादन हो रहा है।

मुनाफे का गणित इतना सटीक है कि हज़ारों पेड़ों के बागान वाले किसान आज प्रति सीजन लाखों की कमाई कर रहे हैं। बाजार में 40 से 60 रुपये प्रति किलो के थोक भाव ने किसानों को बिचौलियों के जाल से मुक्ति दिला दी है। अब व्यापारी खुद खेतों तक पहुँच रहे हैं, जिससे किसानों को उनके पसीने की पूरी कीमत मिल रही है।


यह केवल एक फल की खेती नहीं, बल्कि जशपुर की आर्थिक मजबूती का आधार बन चुका है। नाशपाती के ये लदे हुए बागान अब कृषि-पर्यटन (एग्रो-टूरिज्म) के नए केंद्र भी बन रहे हैं, जो क्षेत्र को पर्यटन के मानचित्र पर भी नई पहचान दे रहे हैं। उद्यानिकी विभाग के प्रोत्साहन से उत्साहित किसान अब अपनी फसल के रकबे को बढ़ा रहे हैं। यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि सही दिशा और मेहनत का साथ मिल जाए, तो जशपुर का किसान न केवल समृद्ध हो सकता है, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए विकास का एक नया ‘मॉडल’ भी पेश कर सकता है।

अपनी सफलता को साझा करते हुए सन्ना क्षेत्र के एक प्रगतिशील किसान बताते हैं, “पहले हम पारंपरिक फसलों पर निर्भर थे, जिसमें मेहनत ज्यादा और मुनाफा कम होता था। लेकिन जब से हमने उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में नाशपाती के बागान लगाए हैं, पूरी तस्वीर बदल गई है।व्यवसायी संतोष सिन्हा ने बताया कि आज एक-एक पेड़ से साल में 400 से 500 किलो फल दे रहा है। 40 से 60 रुपये प्रति किलो का थोक भाव हमें बिचौलियों की चिंता से मुक्त कर देता है।  इस फसल ने हमें आर्थिक रूप से इतना मजबूत बना दिया है कि अब हमारे बच्चे बेहतर शिक्षा पा रहे हैं और हमारा जीवन खुशहाल हो गया है।”

​मुनाफे का यह गणित हज़ारों पेड़ों के बागान वाले किसानों को हर साल लाखों की कमाई करा रहा है।यह केवल एक फल की खेती नहीं, बल्कि जशपुर की आर्थिक मजबूती का आधार बन चुका है। नाशपाती के ये लदे हुए बागान अब कृषि-पर्यटन (एग्रो-टूरिज्म) के नए केंद्र भी बन रहे हैं, जो क्षेत्र को पर्यटन के मानचित्र पर भी नई पहचान दे रहे हैं।

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​उद्यानिकी विभाग के निरंतर प्रोत्साहन से उत्साहित किसान अब अपनी फसल के रकबे को लगातार बढ़ा रहे हैं। जशपुर के किसानों की यह कामयाबी इस बात का ठोस प्रमाण है कि यदि सही दिशा, मेहनती हाथ और प्रकृति का साथ मिल जाए, तो जशपुर का किसान न केवल समृद्ध हो सकता है, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए विकास का एक नया ‘मॉडल’ भी पेश कर सकता है।

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