नई दिल्ली

अपनी मनमोहक सुगंध, मिठाइयों के स्वाद और औषधीय गुणों के लिए दुनिया भर में मशहूर केवड़े (Pandanus) का भारत से नाता मानव सभ्यता से भी पुराना है। भारत के वैज्ञानिकों ने एक ऐतिहासिक खोज में पता लगाया है कि केवड़े का पौधा भारतीय उपमहाद्वीप में कम से कम 2.4 करोड़ (24 मिलियन) वर्षों से अस्तित्व में है। यह वह दौर था जब न तो पृथ्वी पर इंसानों का अस्तित्व था और न ही आज के विशाल हिमालय पर्वत का पूरी तरह निर्माण हुआ था।

यह खुलासा विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (BSIP), लखनऊ के वैज्ञानिकों के एक शोध में हुआ है। वैज्ञानिकों को पूर्वोत्तर राज्य असम के माकुम कोयला क्षेत्र से केवड़े की पत्तियों के अत्यंत दुर्लभ जीवाश्म (Fossils) मिले हैं, जो आधुनिक केवड़े से हूबहू मेल खाते हैं।

असम की कोयला खदानों से मिला करोड़ों साल पुराना इतिहास

बीरबल साहनी संस्थान की शोधकर्ता हर्षिता भाटिया और गौरव श्रीवास्तव ने असम के टिका पर्वत संरचना (कोयला क्षेत्र) से चार संरक्षित जीवाश्म पत्तों को खोज निकाला।

जब इन जीवाश्मों का अत्याधुनिक सूक्ष्मदर्शी (Microscopic) और रूपात्मक विश्लेषण किया गया, तो वैज्ञानिक हैरान रह गए। करोड़ों साल पुराने होने के बावजूद इन पत्तों में वे सभी विशेषताएं मौजूद थीं जो आज के केवड़े में पाई जाती हैं:

  • तलवार के आकार की लंबी पत्तियां।

  • पत्तियों के समानांतर चलने वाली नसें।

  • पत्तियों के किनारों पर बने विशिष्ट सुरक्षात्मक कांटे।

वैज्ञानिकों ने जब इसकी तुलना दुनिया भर के हर्बेरिया (वानस्पतिक संग्रहालयों) और डेटाबेस से की, तो पुष्टि हुई कि यह केवड़ा परिवार (पैंडानेसी) का ही प्राचीन हिस्सा हैं। यह महत्वपूर्ण शोध प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका ‘जियोबियोस’ (Geobios) में प्रकाशित हुआ है।

जब दुनिया से खत्म हो रहा था केवड़ा, तब ‘भारत’ बना इसका रक्षक

शोध के अनुसार, केवड़े का इतिहास बेहद नाटकीय रहा है। आज भले ही यह पौधा भारत और आसपास के उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्रों तक सीमित है, लेकिन आज से 8.5 करोड़ साल पहले यह यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे ठंडे इलाकों में भी बहुतायत में पाया जाता था।

लगभग 3.4 करोड़ वर्ष पहले जब पूरी पृथ्वी का तापमान तेजी से गिरा (ग्लोबल कूलिंग), तो ठंड बर्दाश्त न कर पाने के कारण केवड़ा दुनिया के अधिकांश हिस्सों से विलुप्त हो गया। ऐसे कठिन दौर में भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन उष्णकटिबंधीय जंगलों ने इस पौधे को ‘शरण’ दी। भारत के अनुकूल वातावरण के कारण ही यह प्राचीन पौधा यहाँ जीवित बच सका।

भविष्य के जलवायु परिवर्तन को समझने में मिलेगी मदद

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज केवल अतीत की कहानी नहीं है, बल्कि भविष्य का सुरक्षा कवच भी है। इस अध्ययन से यह समझने में मदद मिलेगी कि कैसे प्राचीन पेड़-पौधों ने खुद को जीवित रखने के लिए जलवायु परिवर्तन का सामना किया। इसके जरिए वैज्ञानिक भविष्य में होने वाले ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय बदलावों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया का सटीक अनुमान लगा सकेंगे।

यह खोज साबित करती है कि केवड़ा भारतीय वनस्पति जगत का कोई नया मेहमान नहीं, बल्कि इस धरती का आदिम निवासी है।

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