दो वर्षों में बढ़े अपहरण के मामले; रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग अपराधों में सबसे आगे, बस्तर संभाग में स्थिति शांत

विशेष संवाददाता | रायपुर

छत्तीसगढ़ की जेलों में कैदियों की सुरक्षा और उनके स्वास्थ्य को लेकर एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य की विभिन्न जेलों में पिछले साढ़े पांच वर्षों के भीतर 375 कैदियों की मौत (जेल अभिरक्षा में मृत्यु) दर्ज की गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 373 मामलों में न्यायिक या दंडाधिकारी जांच के आदेश तो दिए गए, लेकिन 62 मामलों की जांच रिपोर्ट आज भी अप्राप्त (लंबित) है।विधानसभा के मानसून सत्र में गृह मंत्री विजय शर्मा ने कांग्रेस विधायक उमेश पटेल द्वारा पूछे गए एक लिखित सवाल के जवाब में यह बेहद संवेदनशील आंकड़े पेश किए।

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वर्ष 2022 में हुईं सबसे ज्यादा मौतें, इस साल अब तक 35 कैदी गंवा चुके हैं जान

सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जेलों में बंद कैदियों की मौत का सिलसिला लगातार जारी है:वर्ष 2022 कैदियों के लिए सबसे घातक साबित हुआ, जब जेलों में रिकॉर्ड 90 मौतें दर्ज की गईं। इस वर्ष भी केवल शुरुआती साढ़े पांच महीनों (1 जनवरी से 25 जून 2026 तक) के भीतर ही 35 कैदियों की मौत हो चुकी है।

पिछले 5 वर्षों में जेल अभिरक्षा में मृत्यु और जांच की वास्तविक स्थिति

विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2021 से लेकर 25 जून 2026 तक का वर्षवार लेखा-जोखा इस प्रकार है:

वर्ष जेल अभिरक्षा में मौतें जांच के आदेश (प्रकरण) जांच रिपोर्ट प्राप्त जांच रिपोर्ट लंबित (अप्राप्त)
2021 71 71 71 0
2022 90 89 89 0
2023 57 56 56 0
2024 67 67 64 3
2025 55 55 28 27
2026 (25 जून तक) 35 35 3 32
कुल योग 375 373 311 62

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जांच रिपोर्टों में देरी पर उठ रहे हैं सवाल

जवाब में प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि जहां वर्ष 2021 से 2023 तक के सभी मामलों की जांच रिपोर्ट मिल चुकी है, वहीं हाल के वर्षों की जांच कछुआ गति से चल रही है:

  • वर्ष 2024 के 67 मामलों में से 3 मामलों की जांच रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है।

  • वर्ष 2025 के कुल 55 मामलों में से लगभग आधे यानी 27 मामलों की जांच रिपोर्ट आना बाकी है।

  • वर्ष 2026 में अब तक हुई 35 मौतों में से केवल 3 मामलों की ही रिपोर्ट मिल सकी है, जबकि 32 मामलों की जांच लंबित है।

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मानवाधिकार और जेल प्रशासन पर खड़े हुए गंभीर सवाल

जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों का होना, चिकित्सा सुविधाओं की कमी और समय पर इलाज न मिलना कैदियों की मौत के बड़े कारण माने जाते रहे हैं। विधानसभा में इन आंकड़ों के सामने आने के बाद विपक्षी दलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली और लंबित पड़ी जांच रिपोर्टों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। जानकारों का कहना है कि जांच रिपोर्टों में देरी से दोषियों पर कार्रवाई प्रभावित होती है।

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